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वाराणसी में फ्लाईओवर का गिरना और सात सितारा दफ्तर में जश्र को होना

वाराणसी में निर्माणाधीन फ्लाईओवर के दो बीम गिरने की खबर जिसने में सुनी और देखी वह दहल गया। इतना दर्दनाक हादसा कइयो ने शायद अपनी जिंदगी में पहली बार देखा हो। कुछ लोग जो शाम को अपने घरों को लौट रहे थे उनके ऊपर अचानक पहाड़ सा बीम गिर जाता है। उनकी गाडिय़ां पिचक जाती हैं और उनकी जिंदगी एक पल में खत्म हो जाती है। शुरूआती खबरों में बताया कि १८ लोगों के शव मिले हैं लेकिन ५० से अधिक लोग मलबे में दबे हैं। हालांकि बचाव कार्य में लगे कई लोगों ने मरने वालों की संख्या १०० से अधिक बता रहे थे। इतने लोगों की जिंदगी को लील जाने वाला फ्लाईओवर बेहद लापरवाही से बनाया जा रहा था। जाहिर है कि इसमें भ्रष्टाचार भी खूब हुआ होगा। यह भी तय है कि इसे बनाते समय कई मजदूरों ने अपनी जान से पहले भी हाथ धो चुके होंगे। कई मजदूर अंग-भंग होकर घर पर बेकाम बैठ गए होंगे। उनके बारे में खबर नहीं दिखाई और प्रकाशित की गई। वैसे भी मजदूरों की खबर तब तक खबर नहीं होती जब तक कि वह वोट में न तब्दील हो जाएं। मजदूरों कर्मचारियों की बात करने वालों को आजकल देशद्रोही तक कह दिया जाता है। हालांकि चुनावी भाषणों में हर कोई इनका कल्याण करने की...

संत मत परंपरा को तहस-नहस कर दिया गुरमीत राम रहीम ने

सचाई, ईमानदारी और समानता की नींव पर खड़े डेरे को झूठ और आडंबर का शाही महल बना दिया संत मत का अनुसरण करने वाला डेरा सच्चा सौदा आजकल सुर्खियों में है। वजह है डेरे की गद्दी पर आसीन गुरमीत राम रहीम, जिसे दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में 20 साल की सजा मिली है। राम रहीम रोहतक की सुनारिया जेल में बंद है। किसी संत परंपरा वाले गुरु के लिए इससे शर्मनाक हरकत और कोई नहीं हो सकती। लेकिन गुरमीत तो संत है ही नहीं। संत और सूफी परंपरा से तो उसका कोई लेना देना ही नहीं है। उसने तो सूफी और संत परंपरा को पथभ्रष्ट ही नहीं, बल्कि तहस-नहस कर दिया। सादगी, सच्चाई, भाईचारा और समानता की पक्षधर संत परंपरा को गुरमीत ने लूट, ठगी, बेईमानी और अपराध का गढ़ बना दिया। आज न जाने कितने सच डेरा सच्चा सौदा में दफन हैं। इसमें कोई शक नहीं कि यह डेरे के करोड़ों अनुयायियों के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ है। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम पर कई तरह के आरोप लगे और लग रहे हैं। कुल मिलाकर संत से बाबा बने गुरमीत राम रहीम ने देश की एक ऐसी परंपरा का नाश कर दिया, जिसमें देश के बहुसंख्यक आबादी की धड़कनें बसतीं थीं। जिसक...

कर्मचारियों को नींबू की तरह निचोडऩे जा रही मोदी सरकार

साल २०१४ के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी जन सभाओं में अकसर यह कहते थे कि मैं आपके सपनों को पूरा करूंगा। उन्हें सत्ता में आए तीन साल से अधिक हो गए हैं लेकिन उन्होंने देश के किस आदमी के कौन से सपने को पूरा किया है यह तो वही जानता होगा जिसके पूरे हुए होंगे। यह एक हकीकत है कि यह सराकर लगातार जनविरोधी नीतियों को लागू करती जा रही है। नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक ऐसे फैसले लिए हैं जिससे न केवल लाखों लोगों की नौकरी चली गई बल्कि कारोबार तक बंद हो गए हैं। नई नौकरियों का सृजन नहीं होने से रोजगार के अवसर भी कम हो गए हैं। इसी बीच मोदी सरकार ने एक ऐसा कानून लाया है जो कर्मचारी और मजदूर विरोधी है। इस कानून के बाद कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को ही खत्म कर दिया गया है। यह ऐसा कानून है जिसके बाद कर्मचारियों और मजदूरों को एक तरह से बंधुआ बना दिया जाएगा। जिसके पास पैसा होगा वह लोगों ने से मनमाने तरीके से काम करा सकेगा। कारखानों से लेकर दफ्तरों तक और बंदरगाहों से लेकर रेल तक में भी काम के घंटे से लेकर दिहाड़ी मजदूरी तक काम कराने वाले तय करेगा। वह जब चाहे किसी को काम पर रखे और जब ...
पनामा पेपर्स : भारत के शरीफों से कब उतरेगा नकाब? आजकल भ्रष्टाचार चर्चा में है। बिहार में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक गठबंधन टूटकर दूसरा बन गया। इसी के साथ भ्रष्टाचार पर सियासत में नैतिकता की नई परिभाषा भी लिखी गई। दूसरी ओर पड़ोसी देश पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की कुर्सी चली गई। शरीफ की कुर्सी पनामा पेपर्स की वजह से गई है। इसके बाद से भारत भी सवाल उठ रहा है कि यहां के शरीफों का नकाब कब उतरेगा? पूछा जा रहा है कि क्या भारत में भी पनामा पेपर्स में नाम आने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी? भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही मुहिम में शामिल होने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस्तीफा देने के दस मिनट के अंदर ही बधाई देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मसले पर मनमोहन सिंह की तरह मौन हैं। न तो उनकी मन की बात सुनाई दे रही है न ही ट्विटर पर अंगुलिया चल रही हैं। आखिर ऐसा क्यों हैं कि करीब पांच सौ भारतीयों का नाम पनामा पेपर्स में आने के बाद भी हमारे देश में उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है? जबकि पाकिस्तान में प्रधानमंत्री की कुर्सी चली गई? इंटरनेशनल कन्सॉर्टियम ऑ...

सवालों से जूझती संवेदनाआें को झकझोरती कहानियां

-अशोक मिश्र नया ज्ञानोदय का मार्च २००८ का अंक लगभग दो दिन में पढ़ गया। शुरुआत में ही 'ज्ञानोदय` के पूर्व संपादक शरद देवड़ा पर प्रो. परेश ने कम शब्दों में काफी और अच्छी जानकारी दी। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कश्मीर के विख्यात कवि रहमान राही से डॉ. आरसु की बातचीत भी अच्छी रही। कवि राही जी की इस बात से बिल्कुल सहमत हुआ जा सकता है कि साहित्यकार का प्रतिबद्ध होना जरूरी है। यह प्रतिबद्धता दार्शनिक स्तर पर हो सकती है, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी। प्रतिबद्धता कैसी होगी, इसको तय भी रचनाकार खुद ही करता है। कहानियों में इस बार कुछ उल्लेखनीय हैं। अगर बात की जाए, द्रोणवीर कोहली की कहानी 'टीन का ट्रंक` की, तो यह मार्मिक प्रेम कहानी है। एक नन्हीं सी कैटी के प्रति छोटे से बच्चे वजीर की प्रेम कहानी को काफी खूबसूरत अंदाज में पिरोया गया है। कैटी द्वारा चाटे गए नीबू को टीन के ट्रंक में छिपाकर रखने, उसे चोरी चोरी चाटने, बाद मंे सड़ जाने पर भाइयों द्वारा फेंक दिए जाने के बाद भी ट्रंक में बसी नीबू की महक को पूरी जिंदगी महसूस करना अपने आप में अभूतपूर्व है। ज्ञान प्रकाश विवेक की कहानी 'कार` जहां अ...