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या हम धर्मनिरपेक्ष होने की कीमत चुका रहे हैं?

इस बार मानवता के दुश्मनों ने देश की राजधानी दिल्ली को निशाना बनया है। लगातार चार धमाके करके करीब २५ लोगों की जान ले ली और १०० से अधिक लोगों को घायल कर दिया। जेहाद के नाम पर यह ऐसा खून -खराबा है जिसकी जितनी निंदा की जाए कम ही होगी। निर्दोष लोगों की जान लेकर कौन सी जेहाद की जंग लड़ी जा रही है इसका जवाब कौन देगा? एक बड़ा सवाल यह भी उठने लगा है कि या हम धर्मनिरपेक्षता की कीमत चुका रहे हैं? कुछ बीमार मानसिकता के सनकी लोग हैं जो आए दिन देश में खून की होली खेल रहे हैं और हम हैं कि यह सब होते देखने को मजबूर हैं। यह मजबूरी इसलिए है कि हमारी सरकार देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखने केलिए प्रतिबद्ध है। देश में होने वाले बम धमाकों में एक समुदाय विशेष के लोग ही पकड़े जाते हैं। जब उनकी गिरफ्तारियां होती हैं तो यह सवाल भी उठने लगता है कि एक धार्मिक समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। फिर इस पर राजनीति होने लगती है। कुछ लोग विरोध तो कुछ समर्थन में आ जाते हैं और मामला ले-देकर फिर वहीं रहा जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि यदि सरकार सख्ती बरते तो जिस तरह से आए दिन आतंकी अपने नापाक इरादों को अंजाम दे रह...

उदासीन और लापरवाह मानसिकता से बाहर निकलना होगा

पिछले कई महीनों से पंजाब से लेकर हरियाणा और उत्तर प्रदेश में रेलवे स्टेेशन और धार्मिक स्थल उड़ाने की धमकी भरे पत्र मिलते रहे हैं। एक-दो बार इन पत्रों को गंभीरता से लिया गया लेकिन जब कोई वारदात नहीं हुई तो ऐसे पत्रों को गंभीरता से नहीं लिया जाने लगा। माना जाने लगा तो कि यह तो रोज का काम हो गया है। लेकिन आतंकी हमारी इसी मानसिकता का लाभ उठाते हैं। आज यदि देश में धमाके दर धमाके हो रहे हैं और हमारी सरकार, प्रशासन व समाज असहाय से दिखाई दे रहा है तो इसके पीछे हमारी यही मानसिकता है। हमारी लापरवाह संस्कृति हमारे लिए घातक सिद्ध होती जा रही है। लेकिन हम हैं कि इससे कोई सबक नहीं सीख रहे हैं। सजगता और सतर्कता न तो हमारे समाज में रह गई है और न ही पुलिस प्रशासन और खुफिया एजेंसियों में। यही कारण है कि नापाक इरादे वाले आतंकी जहां चाहते हैं और जब चाहते हैं धमाके कर देते हैं। पिछले कई धमाकों के बाद उसमें संलिप्त लोग पकड़े नहीं गए। जिससे यह साबित होता है कि हमारा खुफिया तंत्र और प्रशासन बुरी तरह से नाकारा हो गया है। विस्फोट करने वालों को तो छोड़िए धमकी भरे पत्र लिखने वालों तक को हमारी पुलिस नहीं पकड़ पाई ...