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मार्च, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नाना भी दूध के धुल नहीं हो सकते

एक फिल्म में आइटम गीत को लेकर अभिनेत्री तनुश्री ने अभिनेता नाना पाटेकर पर छे़डछाड़ का आरोप लगाया है। इस पर नाना की सफाई है कि तनुश्री बच्ची है और उनकी बेटी के समान है। वह उसके साथ ऐसी ओछी हरकत नहीं कर सकते। फिल्म निर्माता ने तनुश्री को इस फिल्म से बाहर कर दिया है और तनुश्री से हर्जाना मांगा है। यहां तक तो बात फिल्मी थी। यहां सब चलता भी है। लेकिन अब राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट ्र नवनिर्माण सेना (मानसे)ने तनुश्री के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। नाना को महाराष्ट ्र का गौरव बताते हुए मानसे ने कहा है कि नाना एक सम्मानित व्यि त हैं। तनुश्री ने उनकी छवि को खराब किया है। उसे नाना से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी होगी। यदि उसने ऐसा नहीं किया तो उसके खिलाफ प्रदर्शन किया जाएगा। अब इसे या कहा जाए? राजनीति या फिर एक औरत का अपमान? या एक बाहरी को मुंबई से बाहर खदे़डने की मुहिम? बिना शक नाना एक सम्मानित अभिनेता हैं, लेकिन वह बदमिजाज भी कम नहीं हैं। हो सकता है कि उन्होंने तनुश्री को न छे़डा हो, लेकिन ऐसा न किया हो इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता? नाना और फिल्मी दुनिया के चरित्र को देखते हुए तो और भी।

अपने देश में बेगाने

साहित्य की पत्रिकाआें में जो प्रयोग रवींद्र कालिया करते हैं वह शायद ही कोई संपादक कर पाता है। अपने इसी गुण के कारण कालिया जी हमेशा में चर्चा में रहते हैं। हालांकि इस कारण उनकी यदि आलोचना खूब होती है तो गुणगान भी बहुत किया जाता है। लेकिन चर्चा में रहना राजेंद्र यादव को ही नहीं रवींद्र कालिया को भी आता है। हां, दोनों की अपनी-अपनी शैली है। रवींद्र कालिया के संपादकत्व में निकलने वाली भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक पत्रिका नया ज्ञानोदय का मार्च २००८ अंक पश्चिीमोत्तर भारत में हिंदी लेखन पर है। जिसमें हरियाणा, चंडीगढ़, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली के कवियों और कहानीकारों की रचनाआें को स्थान दिया गया है। जाहिर है कि यह क्षेत्र बहुत बड़ा है और एक अंक में इतने बड़े भूभाग पर रचनाशील लेखकों को समेट पाना मुश्किल ही नामुकिन है। ऐसे में जो रह गए उनका नाराज होना लाजिमी है। मैं मूलत: यूपी के सुल्तानपुर जिले का निवासी हंू, लेकिन मेरा कार्यक्षेत्र पहले दिल्ली और अब पंजाब है। मैं पिछले आठ साल से अधिक समय से पत्नी बच्चों सहित जालंधर में रह रहा हंू। कालिया जी ने इस अंक में मेरी कहानी कु़डीमार

साहित्यकार विष्णु प्रभाकर को एक लाख रुपये दिए

हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने प्रसिद्ध उपन्यासकार और पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित विष्णु प्रभाकर को इलाज के लिए एक लाख रुपये की सहायता दी है। ९६ वर्षीय विष्णु प्रभाकर पिछले ५० वर्षों से साहित्य की सेवा कर रहे हैं। उन्होंने हिंदी की सभी विधाआें में २०० से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। इनमें उपन्यास, कहानी, निबंध, समालोचना और नाटक शामिल हैं। उनको सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार और मूर्ति देवी साहित्य सम्मान से भी सम्मानित किया गया है। विष्णु प्रभाकर का हरियाणा से विशेष लगाव रहा है। वे १६ वर्षों तक हिसार के हरियाणा कृषि फार्म में सेवारत रहे। वे हरियाणा की मिट्ट ी से जु़डे रहे हैं। उन्होंने हरियाणवी परिवेश को लेकर भी काफी कहानियां लिखी हैं। अर्धनारीश्वर नामक उपन्यास बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र के जीवन पर आधारित है, जो १४ वर्ष के शोध के बाद लिखा गया। इस उपन्यास के कारण वे चर्चा में आए। उन्हें इस उपन्यास पर पदम भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नवप्रभात और डा टर नाटक ने भी उन्हें काफी प्रसिद्धि दिलवाई। हरियाणा सरकार द्वारा पहला सूर पुरस्कार विष्णु प्रभाकर को ही दिया गया था। साभार