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मई, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वाराणसी में फ्लाईओवर का गिरना और सात सितारा दफ्तर में जश्र को होना

वाराणसी में निर्माणाधीन फ्लाईओवर के दो बीम गिरने की खबर जिसने में सुनी और देखी वह दहल गया। इतना दर्दनाक हादसा कइयो ने शायद अपनी जिंदगी में पहली बार देखा हो। कुछ लोग जो शाम को अपने घरों को लौट रहे थे उनके ऊपर अचानक पहाड़ सा बीम गिर जाता है। उनकी गाडिय़ां पिचक जाती हैं और उनकी जिंदगी एक पल में खत्म हो जाती है। शुरूआती खबरों में बताया कि १८ लोगों के शव मिले हैं लेकिन ५० से अधिक लोग मलबे में दबे हैं। हालांकि बचाव कार्य में लगे कई लोगों ने मरने वालों की संख्या १०० से अधिक बता रहे थे। इतने लोगों की जिंदगी को लील जाने वाला फ्लाईओवर बेहद लापरवाही से बनाया जा रहा था। जाहिर है कि इसमें भ्रष्टाचार भी खूब हुआ होगा। यह भी तय है कि इसे बनाते समय कई मजदूरों ने अपनी जान से पहले भी हाथ धो चुके होंगे। कई मजदूर अंग-भंग होकर घर पर बेकाम बैठ गए होंगे। उनके बारे में खबर नहीं दिखाई और प्रकाशित की गई। वैसे भी मजदूरों की खबर तब तक खबर नहीं होती जब तक कि वह वोट में न तब्दील हो जाएं। मजदूरों कर्मचारियों की बात करने वालों को आजकल देशद्रोही तक कह दिया जाता है। हालांकि चुनावी भाषणों में हर कोई इनका कल्याण करने की

कुछ पाने की लालसा में उपजी कुंठा

रवीश कुमार ने अपने प्राइम टाइम में नामवर सिंह पर रिपोर्ट क्या दिखा दी कुछ लोगों को बुरा लग गया। उसी दिन से बहुत कुछ लिखा जा रहा है। 1995 से मैं नामवर सिंह का नाम सुन रहा हूं। कभी उनसे मुलाकात नहीं हुई। कभी उनके किसी कार्यक्रम में भी नहीं गया। उनके एक दो साक्षात्कार जरूर पढ़े हैं। हां,  उनका नाम काफी सुना है। कई लोग मिले जो उन्हें कोसते थे। अभद्र भाषा का भी इस्तेमाल करते थे। कई लोग मिले जो उनकी तारीफ भी करते थे। लेकिन मैं नहीं जानता कि नामवर सिंह कैसे हैं। एक समय था कि हिंदी साहित्य की आलोचना में उनकी तूती बोलती थी। कोई ऐसा कार्यक्रम शायद ही होता था जो उनके बिना होता हो। घर का जोगी जोगड़ा में काशीनाथ सिंह ने उन्हें एक बेहतर इंसान, अच्छे शिक्षक और बेहतरीन आलोचक के रूप में चित्रित किया है। शायद उन्होंने भाई होने का धर्म निभाया हो। लेकिन मुझे वह संस्मरण अच्छा लगा। दरअसल मुझे नामवर सिंह से कुछ पाने या हासिल करने की कोई लालसा कभी नहीं रही। नामवरों से मैं वैसे भी थोड़ा दूर रहना पसंद करता हूं। रहता भी हूँ। यही वजह रही कि उनसे कोई ईर्ष्या द्वेष नहीं रख पाया। प्राइम टाइम में जब उन पर रिपोर्ट देखी

ये मैं हूं तुमने क्या जाना

कमजोर को सहेजना गिरते को है उठाना पिटते को है बचाना घाव पर दवा लगाना रोते को है हंसाना दर्द के आंसू पोछना रोटी बांट कर खाना पसीने में मुस्कुराना श्रम का मेहनताना ताना नहीं है मारना झूठ पर ही गुस्साना सच के साथ है रहना तबियत से शूफ़ियाना न किसी को बरगलाना तम को ही है भगाना सच के दीप जलाना न किसी पर मुस्कुराना मिजाज है आशिकाना संकट में भी न घबराना भेष बदल कर न आना खुद से ही होगा सामना बीच में न टांग अड़ाना आता है भिड़ भी जाना ये मैं हूं तुमने क्या जाना - ओमप्रकाश तिवारी

ये मैं हूं तुमने क्या जाना

कमजोर को सहेजना गिरते को है उठाना पिटते को है बचाना घाव पर दवा लगाना रोते को है हंसाना दर्द के आंसू पोछना रोटी बांट कर खाना पसीने में मुस्कुराना श्रम का मेहनताना ताना नहीं है मारना झूठ पर ही गुस्साना सच के साथ है रहना तबियत से शूफ़ियाना न किसी को बरगलाना तम को ही है भगाना सच के दीप जलाना न किसी पर मुस्कुराना मिजाज है आशिकाना संकट में भी न घबराना भेष बदल कर न आना खुद से ही होगा सामना बीच में न टांग अड़ाना आता है भिड़ भी जाना ये मैं हूं तुमने क्या जाना - ओमप्रकाश तिवारी