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बाजार व्यवस्था में छटपटता इनसान

इनसान अपनी ही बनाई व्यवस्था में छटपटा रहा है। विकास की चाह में खुद को बाजार के हवाले करने वाला आदमी आज बाजार की चाल से जार-जार रो रहा है। वित्तीय कंपनियां दिवालियां हो रही हैं और शेयर बाजार फर्श पर लोट रहा है। एक ही दिन में कराे़डों-अरबों का वारा-न्यारा हो जा रहा है। कुछ दिन पहले तक खबरें दुनिया में अरबतियों की बढ़ती संख्या पर आ रही थीं आज अरबों के खाक होने की आ रही हैं। हालात ने सिद्ध कर दिया कि बाजार की भूख को शांत करने लिए पंूजी चाहिए। बाजार की कोई सीमा नहीं, लेकिन पंूजी की है। यहीं से मांग और आपूर्ति में असंतुलन पैदा हो जाता है। ऐसा होते ही बाजार खूंखार हो जाता है। वह ऐसी सांस लेता है कि धरती का विवेकशील प्राणी मनुष्य उसके उदर में समा जाता है। ऐसे हालात इसलिए आते हैं कि मनुष्य अपना विवेक ताक पर रखकर विकास की गति पर सवार हो जाता है। इसी को कहते हैं शेर की सवारी। जब तक आप शेर के ऊपर बैठे हैं तब तक तो ठीक, लेकिन नीचे गिरते ही शेर आपको निगल जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि दुनिया को अपने चाबुक से चलाने वाले इससे कुछ सबक सीखेंगे। सबक उन्हें भी सीखने की जरूरत है जो वैश्वीकरण का अंधानुकरण क...

पहले अपनी गिरेबान में तॊ झांकें

अहा जिंदगी में यश चॊपडा साहब का इंटरवयू पढा। उनका कहना है कि हिंदी में बढिया लेखक नहीं हैं। जॊ बढिया कहानी लिख सकें। यह उनका अनुभव हॊ सकता है लेकिन हकीकत तॊ इससे अलग ही दिखती है। दरअसल फिलम बनाने वाले लेखक कॊ वह सममान ही नहीं देते जिसके वह हकदार हॊते हैं। यही कारण है कि कॊइ भी गंभीर लेखन करने वाला फिलमी दुनिया से नहीं जुड पाता।