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जून, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सेहतमंदों के मुकाबले में विकलांग

हिंदी साहित्य पर फिल्मी असर : हकीकत से दूर कहानी को पुरस्कार कहावत है कि भूखे भजन न होई गोपाला, लेकिन कथादेश की अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता के प्रथम पुरस्कार विजेता प्रेम रंजन अनिमेष ने अपनी कहानी पानी-पानी में भूखे रहकर तीन युवकों से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करवा दी। शायद उन्होंने पाठकों को यह बताने का प्रयास किया है कि गरीब लोग भूखे रह कर भी अपने सपने को पूरे कर सकते हैं। यदि उनका यह मकसद है तो यही हमारी व्यवस्था भी कहती और चाहती है। सपने देखो और मेहनत के बल पर उसे पूरा करो। लेकिन जो गलाकाट प्रतियोगिता इस व्यवस्था में है उसमें तो किसी गरीब को सपने देखने और उसे मेहनत के दम पर पूरा करने को कहने का मतलब है सेहतमंद लोगों की दौड़ में किसी विकलांग को दौड़ा देना। यह व्यवस्था यही तो कर रही है। हजारों धन संपन्न जैसे सेहतमंद लोगों से करोड़ों गरीब जैसे विकलांगों को मुकाबले में उतार दिया गया है। संभत: लेखक इस व्यवस्थ का ही विरोध करना चाहता है लेकिन भाषा-शैली के प्रवाह में वह रूमानी हो गया। वह भूल गया कि किसी भी हालत में एक समय भोजन करके कोई तीन-तीन दिन तक नहीं रह सकता। ऐसे हाल में पढ़ाई

पुरस्कार तो पप्पू को ही मिलेगा

ऐसे दौर में जबकि पुरस्कारों की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठ रहे हों तब कथादेश की कहानी प्रतियोगिता में ढाई सौ कहानीकारों का शामिल होना चौंकाता है। बहुतेरे लेखकों को यह भलिभांति मामलू होता है कि प्रतियोगिता में उसकी रचना को पहले ही छांट दिया जाएगा। यही नहीं पुरस्कार किसी पप्पू को ही दिया जाएगा, तब भी प्रतियोगिता में शामिल होने का ऐसा उत्साह क्या आश्चर्यचकित नहीं करता? हिंदी साहित्य में पुरस्कारों की विश्वसनीयता पर हमेशा ही सवाल उठते रहे हैं लेकिन आज तो हालत यह हो गई है कि जब किसी लेखक को पुरस्कार मिलता है तो पहला सवाल यही मन में आता है कि इसने मैनेज कर लिया। आज के दौर की यह एक हकीकत है कि हिंदी साहित्य में पुरस्कार मैनेज किए जा रहे हैं। कई पत्रिकाओं के संपादक और लेखक इस भूमिका को बखूबी निभा रहे हैं। पिछले दिनों एक गरिमापूर्ण संस्थान ने एक पचास हजार रुपये वाली नवलेखन प्रतियोगिता आयोजित की। उसमें कितने नवलेखकों ने भाग लिया यह तो नहीं मालूम लेकिन पुरस्कार उसे मिला जो उसी संस्थान में काम करता है और पत्रिका के संपादक का पालक-बालक है। चूंकि वह एक पत्रिका में काम करता है और संपादक का पप्पू है तो

पुरस्कृत होने के लिए लिखना

किसी कहानी प्रतियोगिता का पहला पुरस्कार महज दस हजार हो और उसमें से आधे दाम की किताबें मिलनी हों, यह जानते हुए भी उसमें २५० लेखकों द्वारा कहानी भेजना क्या दर्शता है? हिंदी मासिक पत्रिका कथादेश की अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता यह दर्शाती है कि हिंदी के लेखकों के लिए पुरस्कार की राशि कोई मायने नहीं रखती। उनके लिए तो पुरस्कार ही सर्वोपरि है। इससे यह भी पता चलता है कि हिंदी में कितनी प्रचुर मात्रा में कहानियां लिखी जा रही हैं। यदि यह कविता की प्रतियोगिता होती तो संपादक का क्या हाल होता? आप इसकी आसानी से कल्पना कर सकते हैं। केवल दस हजार रुपये के पुरस्कार के लिए इस तरह से टूट पड़ना यह दर्शता है कि हिंदी का लेखक कितना दरिद्र है। वैसे इसे लेखक की उदारता भी कह सकते हैं। उसे पुरस्कार की राशि से कोई मतलब नहीं है। वह तो केवल पुरस्कृत होना चाहता है। देखा जाए तो यह गलत भी नहीं है। हिंंदी में कई ऐसी पत्रिकाएं निकलती हैं जो अपने यहां छपने वाले लेखकों को एक पैसे भी पारश्रमिक नहीं देतीं। बावजूद इसके उन्हें रचनाएं मिलती हैं और वह धड़ल्ले से छपती हैं। इसमें भी दोष लेखकों का ही है। यदि वह मुफ्त में न लिखें

तथ्यों को सुधारते हुए

पिछली पोस्ट में कुछ तथ्यात्मक गलतियां रह गई थीं। दरअसल, कथादेश की कहानी प्रतियोगिता में दो सौ नहीं ढाई सौ कहानियां मिलने का दावा संपादक ने किया है। यही नहीं, पहले पुरस्कार में दस हजार तो ठीक है लेकिन दूसरे पुरस्कार के लिए सात नहीं छह हजार और तीसरे के लिए पांच नहीं चार हजार देने की बात है। चारों सांत्वना पुरस्कारों की राशि दो-दो हजार ही है।

हिंदी में इतने कहानी लेखक और पाठक नहीं

कथा देश का मार्च अंक खास रहा। इसमें पत्रिका ने उन कहानियों को प्रकाशित किया है जिन्हें उसने एक अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता के माध्यम से पुरस्कार देने के लिए चुना है। संपादक का दावा है कि इस प्रतियोगिता के लिए उसे दो सौ से अधिक कहानियां मिली थीं। जिसे कई दिग्गजों के माध्यम से छांटा गया । छांटी गई कहानियों में फिर पत्रिका के निर्णय मंडल ने कहानियों को पुरस्कार के लिए चयनित किया गया। तीन कहानियों को पहला और दूसरा पुरस्कार दिया गया है। तीन को संत्वना पुरस्कार से नवाजा गया है। पहला स्थान प्राप्त करने वाले लेखक को दस हजार रुपये से सम्मानित किया है। दूसरे को सात और तीसरे को पांच हजार रुपये। सांत्वना पुरस्कार के तौर पर शायद दो-दो हजार रुपये दिए गए हैं। लेखकों को पुरस्कार की आधी राशि नकद और आधी की राशि के बराबर मूल्य की किताबें देने की घोषणा की गई है। चौकाने वाली बात है कि पत्रिका को इस प्रतियोगिता के लिए दो सौ कहानियां मिल गईं। इसका तात्पर्य यह है कि हिंदी में दो सौ कहानी लेखक सक्रिय हैं। यह तो प्रतियोगिता में शामिल लेखकों की संख्या है, कितने तो शामिल ही नहीं हुए होंगे। मेरा अपना अनुमान है