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जनवरी, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

देसवा होई गवा सुखारी हम भिखारी रहि गये

ओमप्रकाश तिवारी कथाकार शिवमूर्ति का उपन्यास आखिरी छलांग पढने के बाद मन में उठे कुछ विचार हिंदी के कहानीकारों और कवियों का यदि सर्वे किया जाए तो पाया जाएगा कि अधिकतर रचनाकार गांव की पृष्ठ भूमिसे हैं या थे। लेकिन इसी के साथ शायद यह तथ्य भी सामने आ जाए कि किसी भी लेखक (अपवाद मुंशी प्रेमचंद) ने ग्रामीण समस्या, किसान समस्या, खेतिहर मजदूरों पर प्रमाणिक, तार्किक और वस्तुपरक रचना शायद ही की है। मुंशी प्रेमचंद ने अपना अधिकतर लेखन इन्हीं विषयों या इनके ईद-गिर्द किया। गोदान और रंगभूमि मुंशी प्रेमचंद के ऐसे उपन्यास हैं जो न केवल किसान, दलित, खेतिहर श्रमिकों की समस्याआें पर केंद्रित हैं, बल्कि यह विश्वस्तरीय रचनाएं हैं। इसके बाद व्यापक फलक पर (मेरी समझ से) जगदीश चंद्र ने इस ओर ध्यान दिया है। लेखक और आलोचक तरसेम गुजराल लिखते हैं कि प्रेमचंद ने गोदान में होरी को छोटे किसान से भूमिहीन मजदूर के रूप में स्थगित होते दिखाया है। इसी तरह जगदीश चंद्र के उपन्यास 'धरती धन न अपना` उपन्यास में भूमिहीन दलित सामने आया है।` इसके अलावा जगदीश चंद्र के दो उपन्यास 'नरककुंड में बास` और जमीन अपनी तो थी` उप

पहले अपनी गिरेबान में तॊ झांकें

अहा जिंदगी में यश चॊपडा साहब का इंटरवयू पढा। उनका कहना है कि हिंदी में बढिया लेखक नहीं हैं। जॊ बढिया कहानी लिख सकें। यह उनका अनुभव हॊ सकता है लेकिन हकीकत तॊ इससे अलग ही दिखती है। दरअसल फिलम बनाने वाले लेखक कॊ वह सममान ही नहीं देते जिसके वह हकदार हॊते हैं। यही कारण है कि कॊइ भी गंभीर लेखन करने वाला फिलमी दुनिया से नहीं जुड पाता।