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टके के लिए सब कुछ जायज

पिछले दिनों परिकल्पना प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित बेर्टोल्ट बे्रष्ट की कृति तीन टके का उपन्यास पढ़ रहा था। इस रचना में लेखक ने व्यापारिक पंूजीपति वर्ग की अनैतिकता, लालच और उसके कथित राष्ट ्रवाद की असलियत को नंगा कर दिया है। पंूजीपति वर्ग की जिस तरह से लेखक ने बखिया उधे़डी है उससे सहसा यकीन नहीं होता कि ऐसा भी होता है। यदि होता है तो बहुत ही खतरनाक है। लेखक ने बताया है कि इस समाज में तो मुनाफे के लिए सबकुछ जायज है। यहां लाभ के लिए प्रेम का एक नाटक है, शादी एक व्यापार है, किसी की हत्या करना, बेटी और पत्नी का इस्तेमाल करना सबकुछ ऐसे होता है जैसे किसान अपने पशुआेंे के लिए चारा काटता है। व्यापार और अपराध जगत का गुप्त संबंध ऐसी हकीकत के रूप में सामने आता है कि रूह कांप जाती है। यह सब ऐसी बातें हैं जिन पर मैं विश्वास ही नहीं कर पाया। कई दिनों तक सोचता रहा कि या ऐसा भी होता है? यही कारण है कि उपन्यास पढ़कर रख दिया। किताब में जिन चरित्रों, घटनाआें और दृश्यों को पढ़ा था उनका विश्लेषण जरूरी था। हालांकि प्रकाशक ने दावा किया है कि उपन्यास पढ़ते समय कई बार लगता है कि यह आज के भारत के लिए लिखा गया है...