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अप्रैल, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

खंडन-मंडन और विखंडन की सियासत

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में एक जनसभा को संबोधित करते हुए यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के दलित प्रेम को ढोंग करार दिया। मायावती ने कहा, राहुल जब किसी दलित के घर जाते हैं तो लौटकर नहाते हैं। धूप और अगरबत्ती से उनका शुद्धिकरण किया जाता है। मायावती के इस वार पर कांग्रेस का कहना है कि सच्चाई इससे उलट है। राहुल के बारे में इस तरह का बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का कहना है कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री या बयान देती हैं। यह उनका अधिकार है, पर सच्चाई इसके बिलकुल उलट है। नेहरू-गांधी परिवार के दिल में दलितों के प्रति संवेदना है। यह बात वह दावे के साथ कह सकते हैं कि इस परिवार से ज्यादा कोई दलितों का हितैषी नहीं है। इस सियासी दावे-प्रतिदावे का मतलब साफ है कि यह सब दलित वोट बैंक के लिए किया जा रहा है। गौरतलब है कि इधर राहुल गांधी दलितों में अपनी एक छवि बना रहे हैं। उन्होंने पिछले दिनों अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी के जवाहर पुरवा गांव में एक दलित परिवार के साथ रात गुजारी थी। राहुल ने इस परिवार के साथ रात का खाना खाया और सुबह का न

समालोचक डॉ. बच्चन का निधन

हिंदी साहित्य को नई दिशा देने वाले समालोचक डॉ. बच्चन सिंह का शनिवार को निधन हो गया। पक्षाघात से वह लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। ८९ वर्षीय बच्चन सदैव साहित्यकारों के प्रेरणाश्रोत रहे। उनके परिवार में दो पुत्र डॉ. सुरेंद्र प्रताप सिंह और राजीव सिंह तथा दो पुत्रियां आशा सिंह और कुसुम सिंह हैं। हरिश्चंद्र घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। डॉ. बच्चन को वर्ष २००७ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी पहली रचना 'क्रांतिकारी कवि निराला` से ही हिंदी साहित्य जगत में उनकी पहचान कायम हो गई। 'हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास` के जरिए उन्होंने हिंदी साहित्य को देखने की नई दृष्टि दी। जौनपुर और फिर बनारस में उन्होंने शिक्षा हासिल की। काशी में ही हिंदू इंटरमीडिएट कालेज से अध्यापन शुरू किया। बीएचयू के हिंदी विभाग और फिर वहां से हिमाचल प्रदेश विवि शिमला में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष तथा कुलपति का काम संभाला।

सवालों से जूझती संवेदनाआें को झकझोरती कहानियां

-अशोक मिश्र नया ज्ञानोदय का मार्च २००८ का अंक लगभग दो दिन में पढ़ गया। शुरुआत में ही 'ज्ञानोदय` के पूर्व संपादक शरद देवड़ा पर प्रो. परेश ने कम शब्दों में काफी और अच्छी जानकारी दी। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कश्मीर के विख्यात कवि रहमान राही से डॉ. आरसु की बातचीत भी अच्छी रही। कवि राही जी की इस बात से बिल्कुल सहमत हुआ जा सकता है कि साहित्यकार का प्रतिबद्ध होना जरूरी है। यह प्रतिबद्धता दार्शनिक स्तर पर हो सकती है, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी। प्रतिबद्धता कैसी होगी, इसको तय भी रचनाकार खुद ही करता है। कहानियों में इस बार कुछ उल्लेखनीय हैं। अगर बात की जाए, द्रोणवीर कोहली की कहानी 'टीन का ट्रंक` की, तो यह मार्मिक प्रेम कहानी है। एक नन्हीं सी कैटी के प्रति छोटे से बच्चे वजीर की प्रेम कहानी को काफी खूबसूरत अंदाज में पिरोया गया है। कैटी द्वारा चाटे गए नीबू को टीन के ट्रंक में छिपाकर रखने, उसे चोरी चोरी चाटने, बाद मंे सड़ जाने पर भाइयों द्वारा फेंक दिए जाने के बाद भी ट्रंक में बसी नीबू की महक को पूरी जिंदगी महसूस करना अपने आप में अभूतपूर्व है। ज्ञान प्रकाश विवेक की कहानी 'कार` ज