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या हम धर्मनिरपेक्ष होने की कीमत चुका रहे हैं?


इस बार मानवता के दुश्मनों ने देश की राजधानी दिल्ली को निशाना बनया है। लगातार चार धमाके करके करीब २५ लोगों की जान ले ली और १०० से अधिक लोगों को घायल कर दिया। जेहाद के नाम पर यह ऐसा खून -खराबा है जिसकी जितनी निंदा की जाए कम ही होगी। निर्दोष लोगों की जान लेकर कौन सी जेहाद की जंग लड़ी जा रही है इसका जवाब कौन देगा? एक बड़ा सवाल यह भी उठने लगा है कि या हम धर्मनिरपेक्षता की कीमत चुका रहे हैं? कुछ बीमार मानसिकता के सनकी लोग हैं जो आए दिन देश में खून की होली खेल रहे हैं और हम हैं कि यह सब होते देखने को मजबूर हैं। यह मजबूरी इसलिए है कि हमारी सरकार देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखने केलिए प्रतिबद्ध है। देश में होने वाले बम धमाकों में एक समुदाय विशेष के लोग ही पकड़े जाते हैं। जब उनकी गिरफ्तारियां होती हैं तो यह सवाल भी उठने लगता है कि एक धार्मिक समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। फिर इस पर राजनीति होने लगती है। कुछ लोग विरोध तो कुछ समर्थन में आ जाते हैं और मामला ले-देकर फिर वहीं रहा जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि यदि सरकार सख्ती बरते तो जिस तरह से आए दिन आतंकी अपने नापाक इरादों को अंजाम दे रहे हैं वह न दे पाएं। इसमें कहीं न कहीं वोट बैंक की राजनीति भी जिम्मेदार है। एक समुदाय विशेष का वोट लेने के लिए तुष्टि करण की नीति देश के निर्दोष लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। मैं यह नहीं कहता कि जिस समुदाय के लोगों का नाम आतंकी घटनाआें में आता है उस समुदाय के सभी लोग ऐसी घिनौनी साजिश में शामिल होते हैं। लेकिन यह समुदाय शक के दायरे में तो आ ही गया है। जाहिर सी बात है कि यदि इस समुदाय से लोग ऐसी हरकतों में संलिप्प्त हैं तो इस समुदाय के लोगों का ही फर्ज बनता है कि वह आगे आएं और ऐसे लोगों को अपने समाज से बाहर करें। यह उन्हीं के लिए फायदेमंद होगा। नहीं तो देश की धर्मनिरपेक्षता की छवि को आघात लगेगा और दूसरे समुदायों के लोग इस समुदाय को शक की नजरों से देखेंगे, जोकि बहुत ही शर्मनाक और खतरनाक होगा। यदि आतंकियों का यह नापाक सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो संदेह के घेरे में आए समुदाय विशेष के खिलाफ दूसरे समुदायों के लोग बगावत कर सकते हैं। यह किसी भी सरकार और समाज के लिए खतरनाक चुनौती होगी। जिसकेपरिणाम काफी गंभीर हो सकते हैं। भारत विभिन्न संस्कृतियों का देश है। यहां पर विभिन्न धर्मों को समान रूप से सम्मान दिया जाता है। यही नहीं यहां पर विभिन्न तरह की क्षेत्रीय अस्मिताएं भी हैं, लेकिन यही इसकी विशेषताएं भी हैं। यह विभिन्न फूलों का एक गुलशन है। इस गुलशन को बचाने की जिम्मेदारी माली से अधिक फूलों पर आ गई है। गड़बड़ी जिस समुदाय में हो रही है उस समुदाय की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। वह आगे आकर ऐसे तत्वों को रोके और फलने-फूलने न दे। धार्मिक कट्ट रता किसी भी समुदाय के लिए बम के समान होती है। इसे बढ़ने न दिया जाए तो देश के लिए बेहतर होगा। इसे रोकने की जिम्मेदारी सरकार से आधिक हमारी है।

टिप्पणियाँ

दरअसल देश और यहाँ के बाशिंदे इसी तरह की त्रासदियों को भोगने के लिए अभिशप्त हैं। चरम पर पहुँच चुके भ्रष्टाचार, अय्याशी और क्षेत्रवाद के बीच देश के बारे में सोचने के लिए किसी के पास फुरसत ही नहीं है। हम सहिष्णुता की आड़ में कायरता दिखाते आए हैं। राष्ट्र के बारे में सोच कर निर्णय लेने का समय और क्षमता हमारे पास है ही नहीं। निर्णय के कारक तो सीधे वोट बैक और तुष्टिकरण से जुड़े हुए हैं।

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