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कविता/सवाल

कुछ पसंद नहीं आना
मन का उदास हो जाना
बेमतलब ही गुस्सा आना
हां न कि भी बातें न करना
हर पल आंखें बंद रखना
रोशनी में आंखें मिचमिचना
बिना पत्तों वाले पेड़ निहारना
गिरते हुए पीले पत्तों को देखना
भाव आएं फिर भी कुछ न लिखना
अच्छी किताब को भी न पढ़ना
किताब उठाना और रख देना
उंगलियों से कुछ टाइप न करना
उगते सूरज पर झुंझला पड़ना
डूबते सूरज को हसरत से देखना
चाहत अंधेरे को हमसफ़र बनाना
खुद को तम में विलीन कर देना
ये हमको हुआ क्या जरा बताना
समझ में आये तो जरा समझना
गीत कोई तुम ऐसा जो गाना
शब्दों को सावन की तरह बरसाना
बूंद बूंद से पूरा बदन भिगो देना
हसरतों को इस कदर बहाना
चलेगा नहीं यहां कोई बहाना
#ओमप्रकाश तिवारी

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