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कुछ सियासी बातें

कुछ सियासी बातें अर्थव्यवस्था के विकास का अर्थशास्त्र बताता है कि इसका फल वर्गों में मिलता है। मसलन विकास का 80 फ़ीसदी धन देश के एक फ़ीसदी लोगों के पास संग्रहित हो जाता है। परिणामस्वरूप हर महीने 30-40 अरबपति उत्पन्न हो जाते हैं। साथ ही जो पहले से अमीर हैं वे और अमीर हो जाते हैं। दूसरी ओर विकास का 20 फीसदी धन देश के 80 फीसदी में बंटता है। इनमें भी किसी को मिलता है किसी को नहीं मिलता है। इससे जो गरीब हैं वह और गरीब हो जाते हैं। इस वजह से कई तरह की सामाजिक विसंगतियां उभरतीं हैं। दूसरी ओर देश का चुनाव जाति और धर्म पर लड़ा जाता है। इन दोनों का ही आर्थिक विकास में कोई भूमिका नहीं होती है। लेकिन यही लोग सरकार बनाते हैं। या कहें कि इसी आधार पर सरकार बनती है। इस तरह सरकार बनने और बनाने की प्रक्रिया और सरकार चलाने और चलाने की प्रक्रिया बिल्कुल अलग और भिन्न है। सरकार बनने का बाद सरकार चलाने की प्रथमिकता बदल जाती है। सरकार के केंद्र में वह आ जाता है जिसने वोट देकर सरकार नहीं चुनी होती है बल्कि चंदा देकर अपने पसंद के व्यकितत्व, विचार और दल की सत्तासीन किया होता है। इस तरह मुफ्त का बहुमूल्य मत व्यर...

मैं दिल्ली रोड हूं... आज मैं उदास हूं...

रोहतक में मैं दिल्ली रोड हूं। शहर के बीचों बीच से निकली हूं। हर रोज अनगिनत लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचाती हूं। मेरे ऊपर से हजारों वाहन हर रोज गुजर जाते हैं। लेकिन मैं उफ़ तक नहीं करती। मुझे भी कष्ट होता है। दर्द होता है जब मेरे शरीर पर गड्डों रूपी घाव होते हैं। लेकिन मैं सहती हूं। किसी राहगीर को गिराती नहीं। उसकी जान नहीं लेती। जो अपनी जिंदगी खोते हैं अक्सर उनकी या सामने वाले की ही गलती होती है। कभी ट्रैफिक नियमोँ का न मानना तो कभी तेज रफ्तार। मैं हर मौत पर रोती हूं। अफसोस जताती हूं। अगले ही पल लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने में जुट जाती हूं। आज मैं बहुत उदास हूं। रात भर रोई हूं। मेरे जेहन में कई सवाल हैं जिनका कोई उत्तर नहीं दे रहा है। मैं जानना चाहती हूं कल दोपर मेरे सीने पर चढ़कर जिस लड़की को गोली मार कर हत्या कर दी गयी उसकी गलती क्या थी? यही की उसने किसी से प्यार किया था? एक ऐसे युवक से जो उसकी जाति का नहीं था? जिससे वह प्यार करती थी वह ऐसी जाति से था जिसे यह सभ्य समाज सम्मान नहीं देता? क्यों कोई जाति से छोटा बड़ा  हो जाता है? क्यों रिश्तों से बड़ी जाति हो जाती है? कई बार धर्म...

कविता : बेहतर हो बागों में बहार ही कहिये

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद देशसेवा के लिए पत्रकारिता में राष्ट्रवाद पर शोध ग्रंथ लिखकर प्रोफेसर बने महोदय ने अपनी कक्षा में विद्यार्थियों से कहा कि सरकारी मंशा पर सवाल उठाना पत्रकार का काम ही नहीं है यह काम विपक्षी दल करता है विपक्षी दल की खबर लिखना पत्रकार का काम ही नहीं है सेना-जवान का गुणगान करिये बहुसंख्यक धर्म का बखान करिये धर्मगुरुओं का यशोगान करिये तंत्र पर कब्जाधारी कुछ भी करें तुम तो हमेशा वाह-वाह करिये किसी की संपत्ति कैसे भी बढ़ी तुम उत्थान का बखान करिये मौत का क्या है आ ही जाती है जज की मौत पर न सवाल करिये बेसिन से यदि गैस चुरा ले कोई ऐसी चोरियों पर ध्यान न दीजिए कमाया है धन देशहित में उसने उसकी देशभक्ति का मान रखिये जानवरों में गाय को माता मानिए इन्हें छू दे कोई तो हाहाकार करिये इनकी रक्षा में मरने वाले शहीद हैं इन्हें मारने वाले को शैतान कहिये गिर जाय गर बनता हुआ पुल कोई इसे विपक्षी दल की चाल कहिये बढ़ जाये गर ई-रिक्शे की बिक्री इसे देश में बढ़ता रोजगार कहिये पकौड़े तलना भी है कारोबार ही ऐसो को उद्यमियों में शुमार करिये बेरोजगारी पर कोई सवा...

आम आदमी की खून पी रही उच्च शिक्षा व्यवस्था

हमारे देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था नागरिकों का किस तरह से शोषण कर रही है इसकी एक झलक एचएसबीसी वैश्विक सर्वेक्षण में देखने को मिलती है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत में माता-पिता अपने बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए पैसे जोड़ने के वास्ते छुट्टियों में भी काम करते हैं। वे अपने बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए बैंक से कर्ज भी लेते हैं। 49 प्रतिशत भारतीय माता-पिता समय से अतिरिक्त घंटे काम करते हैं और अपने बच्चों की यूनिवर्सिटी की फीस भरने के लिए दूसरी नौकरी करते हैं। सवाल उठता है कि लोग ऐसा करने को विवश क्यों हैं? दरअसल, उच्च शिक्षा के निजीकरण ने इसे लोगों से दूर कर दिया है। आम आदमी तो अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने की सोच भी नहीं सकता है। यही वजह है कि सरकार कौशल विकास जैसे कार्यक्रमों पर जोर दे रही है। इस तरह सरकार लोगों को ऐसी योजनाओं में उलझा कर अपने दायित्व से दूर हो जाती है। यही नहीं एक खास समुदाय को कमाई और मलाई खाने का मौका देना भी होता है। एचएसबीसी वैश्विक सर्वे में भारत सहित 15 देशों में 10,000 माता-पिता और 1,500 छात्रों की शिक्षा पर किए गए सर्वे में दावा किया गया है कि भ...

सेंसेक्स की चमक में दम तोड़ती जिंदगियां

यह न्यू इंडिया है। यहां भारत गायब है। यहां सेंसेक्स का उछलना या गिरना बड़ी बात है। भूख, बेरोजगारी या आर्थिक तंगी से मरना कोई बात नहीं है। चौकीदार को भागीदारी पर शर्म की जगह गर्व है। उजली कमीज पर दाग अच्छे लगने लगे हैं। ऐसे चमकीले समय में कुछ गंदिली जिंदगियां दम तोड़ती हैं तो क्या आश्चर्य? इंडिया विश्व की छठी अर्थव्यवस्था है। वह विश्व गुरु बनने वाला है। ऐसे में भारत को कौन पूछे? विकास तो इंडिया में कुलाचे भर रहा है, वह भारत क्यों जाय? कुछ दिन पहले देश की राजधानी दिल्ली में तीन बच्चों की मौत भूख से हो गयी। इस सच को नकार कर गंगाजल की तरह पी लिया गया। अब प्रतिदिन उछलते सेंसेक्स और तेज आर्थिक विकास के दावों के बीच झारखंड की राजधानी रांची में आर्थिक तंगी की वजह से एक ही परिवार के सात लोगों की आत्महत्या की खबर सामने आई है। डीआईजी एवी होमकर का कहना है कि ऐसा लग रहा है कि पैसों की तंगी के कारण दो भाइयों ने पहले पूरे परिवार को मार डाला और फिर खुद को फांसी लगा ली। मौके से दो सुसाइड नोट मिले हैं, जिनमें से एक पंद्रह पन्ने का और दूसरा दो पन्ने का है। होमकर ने बताया कि सच्चिानंद झा का बड़ा बेटा दीपक...

मुसाफिर के जाने के बाद

कविता ...…...... मुसाफिर के जाने के बाद …................... मुसाफिर के जाने के बाद कई लोग सामने आएंगे अफसाना सुनाने यकीन मानिए कलम तोड़ देंगे उसकी वाहवाही में खूबियों पर तो पूरी किताब लिख देंगे वश यही नहीं बताएंगे कि गुनहगार वे भी हैं उसके पैरों में पड़े छालों के लिए पथ पर उसके कांटे उन्होंने भी रखे थे कहीं पत्थर रखे तो कहीं गड्ढे खोदे थे मुस्कुराये थे उसके हर एक जख्म पर अब आंसू बहाकर अपने गुनाह धो रहे कितने मतलबी हैं फरेब से ज्यादा फरेबी जो आज सीधे बन रहे टेढ़े इतने जैसे जलेबी @ ओमप्रकाश तिवारी

चमत्कार के चक्कर में न पड़ें...

‘जब हम फंदे पर लटकेंगे तो भगवान के दर्शन होंगे और भगवान हम सबको बचा लेंगे... लेकिन भगवान ने नहीं बचाया और 11 जानें चली गईं। दिल्ली के बुराड़ी के भाटिया परिवार के घर के मंदिर के रजिस्टर में उक्त बातें लिखी मिली हैं। पुलिस इस आधार पर मान  रही है कि चमत्कार के चक्कर में 11 लोगों की जान चली गयी। यह निराधार भी नहीं लग रहा है। दरअसल, इसे आप क्या कहेंगे?  यह अंधविश्वास है कि विश्वास है या आस्था है? जहां न कोई सवाल होता है न ही तर्क किया जाता है। सवाल किया भी जाता है तो अव्वल तो जवाब दिया नहीं जाता और यदि दिया भी गया तो वह बेकार का कुतर्क होता है। किसी चमत्कार में लिपटी कहानियां किसी के नाम की कथा के रूप में सुना दी जाती हैं। इस धरती पर या कहें ब्रम्हांड पर कुदरत ही अंतिम सत्य है। वही संचिलत करती है पूरे ब्रम्हांड को। जिज्ञासु और प्रकृति का मित्र बनकर ही उसे जाना समझा जा सकता है। इसी के बीच से मनुष्य अपने विकास का रास्ता निकाल सकता है और खुद के भी अस्तित्व को बचा सकता है। वरना हश्र बुराड़ी के भाटिया परिवार जैसा ही होगा। भाटिया परिवार तो खत्म हो गया लेकिन दुनिया में अरबों लोग आस्था और च...