रविवार, 25 मार्च 2012
उनकी नजाकत पर आंकड़ों की नफासत तो देखिए
आंकड़े बेजुबान होते हैं लेकिन बहुत कुछ कहते हैं। बेदर्द लगते हैं पर संवेदनशील होते हैं। तस्वीर नहीं होते लेकिन तस्वीर बनाते हैं। आईना नहीं होते लेकिन तस्वीर दिखाते हैं। कलाकार नहीं होते लेकिन कलाकारों के औजार होते हैं। बेजान दिखते हैं लेकिन उनमें कई सच धड़कता है। चतुर सुजान अपना सच उनके माध्यम से छिपाते हैं और भ्रम फैलाते हैं लेकिन आंकड़ों की अदा देखिए कि वह सच ही कहते हैं और सच ही दिखाते हैं।
योजना आयोग का कहना है कि देश से गरीबी घट रही है। करोड़ों बिलबिलाते और तिलतिल कर मरने वालों के देश में सचमुच यह खुश होने वाली खबर है। क्या यह सच है या हकीकत पर खुशफहमी का परदा डालने की नादान होशियारी है। योजना आयोग कहता है कि यदि कोई शहरी प्रतिदिन 28 रुपये 65 पैसे खर्च करता है तो वह गरीब नहीं है। जबकि गांवों में 22 रुपये 42 पैसे खर्च करने वाले को गरीब नहीं कहा जा सकता। इस तरह महीने में 859 रुपये 60 पैसे खर्च करने वाला शहरी और 672 रुपये 80 पैसे खर्च करने वाला ग्रामीण गरीब की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
आप सरकार हैं। कोई भी श्रेणी बनाएं और उसमें डाल दें। गरीब आदमी क्या कर सकता है? उसे तो यह भी नहीं पता कि उसके लिए आप कितने चिंतित हैं। अपनी कारीगरी से उसके कुनबे को ही कम कर दे रहे हैं। किसी गरीब को यदि यह पता चले तो वह जरूर पूछेगा कि जरा एक दिन इतने पैसे में जिंदगी जी कर दिखाइए जनाब। कसम से, मां से नानी तक की याद न आए जाए तो कहना। माफ कीजिएगा, हत्या खंजर, बंदूक या बम से ही नहीं की जाती। करोड़ों लोगों के अस्तित्व को जिस नजाकत-नफासत से आपने इनकार कर दिया, कत्ल तो उसे भी कहते हैं। फर्क वश इतना है कि हत्या करने वाले सजा पाते हैं और आप ईनाम के हकदार हो जाते हैं।
आप कहते हैं कि पिछले पांच वर्षों में गरीबी घटी है। वर्ष 2004-05 के मुकाबले वर्ष 2010-11 में गरीबी 7.3 प्रतिशत कम हो गई है। वर्ष 2010-11 देश में गरीबी की दर 29.8 फीसदी रह गई, जबकि पांच साल पहले यह 37.2 फीसदी थी। अब देश में करीब 34.37 करोड़ लोग गरीब हैं, जबकि 2004-05 में 40.72 करोड़ लोग गरीब थे।
सच क्या है आप बेहतर जानते हैं। कोई भी संवेदनशील, समझदार और चिंतनशील इनसान इन आंकड़ों पर विश्वास नहीं करेगा। वैसे भी ये आंकड़े आपकी नीयत को दर्शाते और बताते हैं। हकीकत तो यह है कि देश की करीब 70 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीने को मजबूर है।
आप कहते हैं कि शहर में करीब 860 रुपये प्रतिमाह कमाने वाला गरीब नहीं है। हिसाब लगाकर देखिए, दस हजार रुपये प्रतिमाह कमाने वाला भी ठीक से गुजारा नहीं कर पा रहा है। किसी भी शहर में हजार रुपये प्रतिमाह से कम का एक कमरा किराये पर नहीं मिलता। (इस एक हजार वाले भी आप नहीं रह सकते) यदि किसी व्यक्ति को शहर में किराये का कमरा लेकर रहना है तो वह 860 रुपये में कैसे रहेगा? उसकी कमाई तो कमरे के किराये को भी पूरा नहीं करती? फिर खाएगा क्या और पहनेगा क्या? आपको यकीन नहीं होगा लेकिन ऐेसे हालात में देश में करोड़ों लोग रह रहे हैं।
मान लो यदि किसी का शहर में अपना घर है, तो क्या वह अपने परिवार का भरण-पोषण इतने पैसों में कर लेगा? आधा किलो दूध भी लेगा तो आधे पैेसे तो इसी में चले जाएंगे। 15 किलो आटा के 200 रुपये तो 15 किलो चावल के करीब 375 रुपये हो जाते हैं। इस तरह आटा, चावल और दूध के ही हजार रुपये से ऊपर हो गए। कपड़े-लत्ते, हारी-बीमारी का क्या? बच्चों की स्कूल फीस और किताबों का क्या ? सब्जी कहां से आएगी? और नमक भी तो नहीं खरीद पाएंगे? दाल की बात तो दूर की कौड़ी हो जाएगी। कहीं आने जाने के लिए किराया कहां से लाएंगे? किसी दिन रेस्टोरेंट में खाने का मन हुआ तो क्या आपके घर चले जाएंगे?
जाहिर है कि जिन आंकड़ों से आप सच को छिपाना चाह रहे हैं वहीं आंकड़े आपकी हकीकत बयां कर रहे हैं। आप अपनी नजाकत पर खुश और मुग्ध हो सकते हैं। लेकिन आंकड़ों की नफासत तो देखिए वे अपने ही रचनाकार पर मुस्कुरा रहे हैं। सृजनकर्ता को हत्यारा बता रहे हैं।
शनिवार, 10 दिसम्बर 2011
बंद बोतल में पुरानी शराब
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शुक्रवार, 7 जनवरी 2011
आचरण के आईने में गलत-सही का द्वंद्व
बुधवार, 18 अगस्त 2010
चित्तौड़गढ़ में राजस्थानी कवि का सम्मान
मधुरेश, ज्योतिष जोशी और डॉ.शोभाकांत झा को प्रमोद वर्मा सम्मान
वाणी परमार को प्रथम शोध वृति अज्ञेय और शमशेर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
रायपुर । प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा हिन्दी आलोचना में उल्लेखनीय योगदान के लिए 2010 का प्रमोद वर्मा सम्मान प्रख्यात कथा-आलोचक मधुरेश और युवा आलोचक ज्योतिष जोशी को प्रदान किया गया । इसके अलावा प्रमोद वर्मा रचना सम्मान से वरिष्ठ ललित निबंधकार डॉ. शोभाकांत झा को अंलकृत किया गया तथा वाणी परमार को एक वर्ष की शोधवृत्ति प्रदान की गई । प्रेमंचद जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में प्रतिष्ठित रचनाकार-आलोचक द्वय डॉ. धनंजय वर्मा और नंदकिशोर आचार्य ने क्रमश- 21, 11 व 7 हज़ार रुपये की नगद राशि, स्मृति चिन्ह, अलंकरण पत्र प्रदान कर रचनाकारों का सम्मान किया । इस प्रतिष्ठित सम्मान के चयन समिति के सदस्य थे – केदार नाथ सिंह, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, विजय बहादुर सिंह, डॉ. धनंजय वर्मा व विश्वरंजन । इसके पूर्व यह सम्मान श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन को मिल चुका है । 1965 से आलोचना कर्म में सक्रिय श्री मधुरेश ने कहा कि उनकी सोच साहित्य में सकारात्मकता से है । रचना और आलोचना में ईमानदारी पर बल दिये बग़ैर जो कार्य होता है वह स्थायी नहीं होता । समय उसका नोटिस नहीं nslennलेता । युवा आलोचक श्री जोशी ने अपने वक्तव्य में कहा कि संस्कृति आलोचना साहित्य तक ही सीमित नहीं होती । रचना की समीक्षा भावप्रक्रिया की उपज है । आलोचना पाठक को मार्ग दिखाता है । आज हम बाज़ारवाद की राजनीतिक समस्या से घिरे हुए हैं, इसीलिए भाषा की गति बुरी हो रही है । मुख्य अतिथि श्री आचार्य ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि साहित्य ज्ञानार्जन है । साहित्य, कला में अनुभूति की अहमियत होती है । साहित्य को जानने के लिए अनुभूति के साथ विचार भी आवश्यक है ।
अलंकरण समारोह में 20 से अधिक किताबों का विमोचन भी विभिन्न विद्वान साहित्यकारों के हाथों संपन्न हुआ जिसमें नई त्रैमासिकी पांडुलिपि, अज्ञेय पर केंद्रित कृति ‘कठिन प्रस्तर में अगिन सुराख’ (विश्वरंजन), शमशेर पर केंद्रित कृति ‘ठंडी धुली सुनहरी धूप’ (विश्वरंजन), ‘शिलाओं पर तराशे मज़मून’ (डॉ. धनंजय वर्मा पर एकाग्र), मीडिया : नये दौर,नयी चुनौतियाँ (संजय द्विवेदी, भोपाल),‘पक्षी-वास’ (अनुवादक-दिनेश माली, उड़ीसा), झरोखा (पंकज त्रिवेदी, अहमदाबाद),विष्णु की पाती – राम के नाम (विष्णु प्रभाकर के पत्र- जयप्रकाश मानस), ‘कहानी जो मैं नहीं लिख पायी’ (कुमुद अधिकारी, नेपाल), डॉ. के. के. झा, बस्तर की 11 किताबें और लघु पत्रिका ‘देशज’ (अरुण शीतांश, आरा) प्रमुख हैं ।
अंलकरण समारोह के पश्चात अज्ञेय और शमशेर की जन्मशताब्दी वर्ष के परिप्रेक्ष्य में ‘अज्ञेय की शास्त्रीयता’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. कमल कुमार,दिल्ली डॉ. आनंदप्रकाश त्रिपाठी-सागर, डॉ.देवेन्द्र दीपक-भोपाल, डॉ. रति सक्सेना-त्रिवेंन्द्रम, डॉ. सुशील त्रिवेदी-रायपुर, बुद्धिनाथ मिश्र-देहरादून, महेन्द्र गगन-भोपाल श्री प्रकाश मिश्र-इलाहाबाद, माताचरण मिश्र-भोपाल,श्री संतोष श्रेयांस-आरा आदि ने अपने आलेखों का पाठ किया । संगोष्ठी के अध्यक्ष मंडल में थे नंदकिशोर आचार्य, डॉ. धंनजय वर्मा व श्री मधुरेश । द्वितीय सत्र केंद्रित था–‘शमशेर का कविता-संसार’ विषय पर । वक्ता थे डॉ. रोहिताश्व-गोवा, प्रभुनाथ आजमी-भोपाल, ज्योतिष जोशी-दिल्ली, नरेन्द्र पुंडरीक-बांदा, बक्सर, संतोष श्रीवास्तव-मुंबई, दिवाकर भट्ट-हलद्वानी, मुकेश वर्मा-भोपाल, कुमार नयन-बक्सर, डॉ. सुधीर सक्सेना-दिल्ली । सत्र को अपनी अध्यक्षीय गरिमा प्रदान की दिविक रमेश, डॉ. त्रिभुवन नाथ शुक्ल, डॉ. धनंजय वर्मा ने ।
अलंकरण समारोह की पूर्व संध्या 30 जुलाई को कविता पाठ से दो दिवसीय राष्ट्रीय समारोह का प्रारंभ हुआ जिसमें देश के प्रतिष्ठित कवि- सर्वश्री नंदकिशोर आचार्य, दिविक रमेश, बुद्धिनाथ मिश्र, श्रीप्रकाश मिश्र, नरेंद्र पुंडरीक, अनिल विभाकर, रति सक्सेना सुधीर सक्सेना अरुण शीतांश, संतोष श्रेयांश, शशांक शेखर, कुमुद अधिकारी(नेपाल), कुमार नयन, जयशंकर बाबु आदि ने अपनी श्रेष्ठ कविताओं का पाठ किया । इसभी सत्रों का संचालन क्रमशः अशोक सिंघई, संजय द्विवेदी, मिर्जा मसूद और गिरीश पंकज ने किया । इस अवसर पर टैगोर, शमशेर, अज्ञेय, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एवं प्रमोद वर्मा की कविताओं की प्रदर्शनी भी आयोजित की गई । आयोजन में देश एवं राज्य के लगभग 500 साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों एवं शिक्षाविदों ने अपनी भागीदारी रेखांकित की ।
जयप्रकाश मानस
संपादक
सृजनगाथा
शनिवार, 14 अगस्त 2010
मगही दिवस के रूप मे मनेगी योगेश की जयंती
बाढ़ । मगही कवि स्व. योगेश्वर सिंह योगेश की पुण्यतिथि समारोह के मौके पर बीती रात नीरपुर गांव मे अखिल भारतीय मगही-कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन की अध्यक्षता साहित्यकार (magahi akadami ke adhyaksh) उदय शंकर ने की जबकि संचालन मगही के चर्चित कवि रामाश्रय झा ने किया। सम्मेलन मे बिहार व यूपी की विभिन्न जगहो से आये साहित्य- काव्य के कई दिग्गज पुरोधा शामिल हुए। कवियो की व्यंगात्मक व समाजिक कुरितियो पर प्रहार करती काव्य रस की सुर सरिता मे श्रोतागण देर रात तक झूमते रहे। हिसुआ से आये चर्चित कवि दीनबंधु, कवि कारू गोप, जयराम जी, व गोपालगंज के पंकज जी समेत अन्य साहित्यकारो ने सामाजिक अव्यवस्था पर चोट करती कविता पाठकर लोगो को मंत्र मुग्ध कर दिया। इस मौके पर कवि योगेश फाउंडेशन के द्वारा मगही मंडल के अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार डा. रामनंदन जी को 2010 का योगेश शिखर सम्मान प्रदान किया गया। एक साथ जुटे मगही साहित्य के दिग्गजो ने इस मौके पर घोषणा किया कि कवि स्व. योगेश की जयंती 23 अक्टूबर को मगही दिवस के रूप मे मनाया जायेगा। समापन समारोह को संबोधित करते हुए मृत्युंजय कुमार ने कहा कि कवि योगेश जी की 1950 के दशक की दुर्लभ पांडुलिपियां मगही मंडल व बिहार सरकार को साप देंगे ताकि मगही साहित्य का प्रचार प्रसार व्यापक रूप से हो सके।



