गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012


परिवर्तन लाजमी है तो डरना क्यों?
- ओमप्रकाश तिवारी
मानव सभ्यता अंतरविरोधों के परमाणु बम जैसी है। इसके अंतरविरोध परिवर्तनशील बनाकर इसे आगे बढ़ाते हैं तो यही इसका विनाश भी करते हैं। मानव जाति का इतिहास गवाह है कि भूत में कई सभ्यताएं तबाह हो गईं जिनके मलबे से खाद-पानी लेकर नई सभ्यताओं ने जन्म लिया और फली-फूली हैं। यही वजह है कि मानव भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है। उसकी अधिकतर योजनाएं बेहतर भविष्य के लिए होती हैं। लेकिन हर आदमी, हर समाज और हर सभ्यता व संस्कृति हमेशा बेहतर नहीं साबित होती। अक्सर इंसानी अनुमान धरे केधरे रह जाते हैं और भविष्य कुछ का कुछ हो जाता है।
वामपंथी चिंतक कार्ल मार्क्स का आकलन था कि पूंजीवादी व्यवस्था अपनी तबाही के लिए खुद ही रास्ते बनाती है। यही वजह है कि एक दिन यह व्यवस्था तबाह हो जाएगी और इसके स्थान पर नई व्यवस्था सामने आएगी। नई व्यवस्था क्या होगी इसकी भी मार्क्स ने कल्पना की और बताया कि वह साम्यवादी व्यवस्था होगी। लेकिन ऐसा हुआ क्या? आज लगभग पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था है। सोवियत रूस जैसे देशों में साम्यवादी व्यवस्था आई भी तो वह पूंजीवादी व्यवस्था से पहले ही ढह हो गई। चीन साम्यवाद के रूप में पूंजीवाद को ही बढ़ावा दे रहा है। (उत्तरकोरिया और क्यूबा आदि अपवाद हो सकते हैं) इस तरह मार्क्स का आकलन अभी तक पूरी तरह सही साबित नहीं हो पाया है। इसी तरह भवष्यि के बारे में किसी का भी आकलन सही साबित हो यह जरूरी नहीं है। आने वाले वर्षाें में मार्क्स का कथन सत्य साबित हो जाए इस पर आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रकृति, मानव, समाज और सभ्यता एवं संस्कृति का बदलाव लाजमी है। इसी के साथ आज जो व्यवस्था है आने वाले वर्षों में उसका बदलना भी अनिवार्य है। आज की पूंजीवादी व्यवस्था आने वाले वर्षों में ऐसी ही रहेगी इसकी कोेई गारंटी नहीं है। आने वाले वर्षों में हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी रहेगी इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। किसी भी देश का मानाव समाज नहीं बदलेगा और संस्कृति भी इसी तरह ही रहेगी इसे भी आज ही सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।
बदलाव तय है। परिवर्तन तय है तो इससे डर कैसा? दरअसल, डर बदलाव या परिवर्तन से नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रिया से लगता है। आने वाले परिणामों से लगता है। मसलन, एक डर यह है कि एक दिन हिंदी भाषा खत्म हो जाएगी। यदि हिंदी भाषा खत्म हो जाएगी तो क्या हिंदी भाषी समाज गूंगा हो जाएगा? जवाब नहीं ही है। हिंदी भाषी समाज अपनी सुविधानुसार नई भाषा तैयार कर लेगा। प्रकृति, पाली, संस्कृत आदि भाषाओं से हमें यही सबक मिलता है। यदि हिंदी भाषी समाज दूसरी भाषा नहीं तैयार कर पाया तो भाषा ही नहीं एक सभ्यता का अंत हो जाएगा।
आजकल देश में किराना बाजार (रिटेल) में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश (एफडीआई) का बहुत शोर है। एक तरफ सरकार है, जो कह रही है कि पैसा पेड़ों पर नहीं लगता। यदि देश की अर्थव्यवस्था का विकास चाहिए तो एफडीआई जरूरी है। दूसरी तरफ विपक्ष है, जो कह रहा है कि इससे देश बरबाद हो जाएगा। देश गुलाम हो जाएगा। किसान बरबाद हो जाएंगे। देश के करोड़ों खुदरा व्यापारी तबाह हो जाएंगे। दरअसल, क्या ऐसा हो जाएगा, जैसा कि कहा जा रहा है? अभी तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही आकलन करके आशंका और संभावना ही व्यक्त कर रहे हैं। दोनों केआकलन केपीछे तथ्य होंगे, जिनकेआधार पर दोनों भविष्य की तस्वीर खींच रहे हैं, लेकिन भविष्य की जैसी तस्वीर बनाई जा रही है वह आने वाले दिनों में वैसी ही हो, इसकी कोई गांरटी नहीं है।
सरकार का आकलन सही हो सकता है, क्योेंकि वह वर्तमान को देखते हुए फैसला कर रही है। (केवल एफडीआई के मामले में) हमारी अर्थव्यवस्था की विकास की गति धीमी हो गई है ऐसे में उसमें पूंजी लगाने की आवश्यक्ता है लेकिन सरकार केपास पूंजी नहीं है। देश केपूंजीपतियों का निवेश भी पर्याप्त नहीं है या वह विदेशी पूंजी का साथ चाहते हैं। ऐसे में सरकार को रिटेल में विदेशी पूंजी के लिए रास्ता खोलना पड़ रहा है। अब यह विदेशी पूंजी आएगी तो कितनी? और अर्थव्यवस्था को किस रूप में लाभ पहुंचाएगी, इसे आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन फिलहाल इसके माध्यम से एक बेहतर रास्ता दिखता है अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए।
विपक्ष की आशंका में इसलिए ज्यादा दम नजर नहीं आता, क्योंकि आने वाले वर्षाें में न केवल समाज को बदलना है बल्कि उसकी व्यवस्था को भी बदलना है। भारत में आज खुदरा बाजार का जैसा स्वरुप है, आने वाले वर्षों में उसका स्वरूप ऐसा ही कदापि नहीं रहने वाला। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भूत में हमारी ऐसी कई सामाजिक व्यवस्थाओं का स्वरूप बदला है। एक समय था कि गांवों में नाई, पंडित, धोबी, कहार, कुम्हार, हलवाहा और केवट आदि काम के बदले अनाज लिया करते थे अपने यजमानों से। लेकिन आज ऐसा नहीं है। धोबी, कहार, कुम्हार और हलवाहा जैसी व्यवस्थाओं का आज अस्तित्व नहीं रह गया है। इन धंधों से जुड़े लोगों को आज आजीविका के लिए दूसरा काम करना पड़ रहा है। इसी तरह एक समय था कि किसानों केखेतों में काम करने वाले कामगार अपने श्रम के बदले अनाज लेते थे लेकिन आज वह नकद लेते हैं।
किसानों का भी स्वरुप बदला है। देश के कुछ राज्यों को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकतर राज्यों में अधिकतर किसान सीमांत जोत वाले हैं। आने वाले दिनों में इनमें से अधिकतर सीमांत से भूमिहीन होकर कामगार हो जाएंगे। जनसंख्या के घनत्व ने खेती की जमीनों पर ऐसा दबाव डाला है कि खेती किसी के लिए जीने का एक मात्र साधन नहीं रह गई है। खेती में हो रहे इस परिवर्तन को समझना होगा। आज भले ही हमारे देश की अधिकतर आबादी गांवों में रह रही है। लेकिन आने वाले दिनों में ऐसा ही रहेगा यह मान लेना कतई उचित नहीं होगा। गांवों से शहरों की तरफ जिस तेजी से युवाओं का पलायन हो रहा है और शहरों में जिस तरह से जनसंख्या का दवाब बढ़ रहा है, उससे शहरीकरण तेजी से बढ़ेगा। गांव खत्म होकर शहर और कस्बों में समा जाएंगे। तब न ऐसा समाज रहेगा न ही ऐसी कोई व्यवस्था। सभी व्यवस्थाएं और समाज समयानुकूल और आवश्यकतानुकूल बदल जाएंगे।
आज शहरों की युवा पीढ़ी मॉल में घूमना और खरीदारी करना पसंद करती है। यह वह पीढ़ी है जो विदेश में पढ़ाई करना, नौकरी करना और वहां रहने के लिए लालायित रहती है। यही नहीं देश में भी उसे विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी करना अधिक बेहतर और सुविधाजनक लगता है। युवा पीढ़ी की यह पसंद और रुचियां यूं ही नहीं बनी होंगी। यह कहना कि उनमें विवेक नहीं है, निरा बेवकूफी होगी। ऐसे मे रिटेल में एफडीआई का विरोध करने वाले और उसका समर्थन करने वाले कहां खड़े हैं यह समझना कोई मुश्किल काम नहीं है।
रही बात केंद्र सरकार से तृणमूल कांग्रेस का समर्थन वापस लेने का तो यह देश केभले के लिए बहुत पहले हो जाना चाहिए था। भारतीय रेल का जिस तरह से बंटाधार ममता बनर्जी और उनके नेताओं ने किया है वैसा ही बंटाधार वह पश्चिम बंगाल का भी करेंगी और कर रही हैं। आज पश्चिम बंगाल वामपंथ की अंधेरी सुरंग से निकलकर ममता बनर्जी नामक अंतहीन छोर वाली उससे कहीं अंधेरी सुरंग में फंस गया है। शुक्र है कि भारतीय रेल इससे निकल गई है। रही बात भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों की तो वह हमेशा दिशाहीन रहे हैं और आगे भी रहेंगे। उनकी आज की उछल-कूद का भविष्य में क्या लाभ होगा इसे वह अच्छी तरह से जानते हैं। यह बात तो दावे से कही जा सकती है कि सत्ता में आने के बाद यह लोग भी वही करेंगे जो आज की सत्तारूढ सरकार कर रही है। आम जनता को इंतजार करना चाहिए इस बार के लोकसभा चुनाव केबाद के वक्त का। उस समय केलिए जो हास्यास्पद नाटक का मंचन होगा उसकी स्क्रिप्ट फिलहाल लिखी जा रही है।

परिवर्तन लाजमी है तो डरना क्यों?
- ओमप्रकाश तिवारी
मानव सभ्यता अंतरविरोधों के परमाणु बम जैसी है। इसके अंतरविरोध परिवर्तनशील बनाकर इसे आगे बढ़ाते हैं तो यही इसका विनाश भी करते हैं। मानव जाति का इतिहास गवाह है कि भूत में कई सभ्यताएं तबाह हो गईं जिनके मलबे से खाद-पानी लेकर नई सभ्यताओं ने जन्म लिया और फली-फूली हैं। यही वजह है कि मानव भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है। उसकी अधिकतर योजनाएं बेहतर भविष्य के लिए होती हैं। लेकिन हर आदमी, हर समाज और हर सभ्यता व संस्कृति हमेशा बेहतर नहीं साबित होती। अक्सर इंसानी अनुमान धरे केधरे रह जाते हैं और भविष्य कुछ का कुछ हो जाता है।
वामपंथी चिंतक कार्ल मार्क्स का आकलन था कि पूंजीवादी व्यवस्था अपनी तबाही के लिए खुद ही रास्ते बनाती है। यही वजह है कि एक दिन यह व्यवस्था तबाह हो जाएगी और इसके स्थान पर नई व्यवस्था सामने आएगी। नई व्यवस्था क्या होगी इसकी भी मार्क्स ने कल्पना की और बताया कि वह साम्यवादी व्यवस्था होगी। लेकिन ऐसा हुआ क्या? आज लगभग पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था है। सोवियत रूस जैसे देशों में साम्यवादी व्यवस्था आई भी तो वह पूंजीवादी व्यवस्था से पहले ही ढह हो गई। चीन साम्यवाद के रूप में पूंजीवाद को ही बढ़ावा दे रहा है। (उत्तरकोरिया और क्यूबा आदि अपवाद हो सकते हैं) इस तरह मार्क्स का आकलन अभी तक पूरी तरह सही साबित नहीं हो पाया है। इसी तरह भवष्यि के बारे में किसी का भी आकलन सही साबित हो यह जरूरी नहीं है। आने वाले वर्षाें में मार्क्स का कथन सत्य साबित हो जाए इस पर आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रकृति, मानव, समाज और सभ्यता एवं संस्कृति का बदलाव लाजमी है। इसी के साथ आज जो व्यवस्था है आने वाले वर्षों में उसका बदलना भी अनिवार्य है। आज की पूंजीवादी व्यवस्था आने वाले वर्षों में ऐसी ही रहेगी इसकी कोेई गारंटी नहीं है। आने वाले वर्षों में हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी रहेगी इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। किसी भी देश का मानाव समाज नहीं बदलेगा और संस्कृति भी इसी तरह ही रहेगी इसे भी आज ही सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।
बदलाव तय है। परिवर्तन तय है तो इससे डर कैसा? दरअसल, डर बदलाव या परिवर्तन से नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रिया से लगता है। आने वाले परिणामों से लगता है। मसलन, एक डर यह है कि एक दिन हिंदी भाषा खत्म हो जाएगी। यदि हिंदी भाषा खत्म हो जाएगी तो क्या हिंदी भाषी समाज गूंगा हो जाएगा? जवाब नहीं ही है। हिंदी भाषी समाज अपनी सुविधानुसार नई भाषा तैयार कर लेगा। प्रकृति, पाली, संस्कृत आदि भाषाओं से हमें यही सबक मिलता है। यदि हिंदी भाषी समाज दूसरी भाषा नहीं तैयार कर पाया तो भाषा ही नहीं एक सभ्यता का अंत हो जाएगा।
आजकल देश में किराना बाजार (रिटेल) में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश (एफडीआई) का बहुत शोर है। एक तरफ सरकार है, जो कह रही है कि पैसा पेड़ों पर नहीं लगता। यदि देश की अर्थव्यवस्था का विकास चाहिए तो एफडीआई जरूरी है। दूसरी तरफ विपक्ष है, जो कह रहा है कि इससे देश बरबाद हो जाएगा। देश गुलाम हो जाएगा। किसान बरबाद हो जाएंगे। देश के करोड़ों खुदरा व्यापारी तबाह हो जाएंगे। दरअसल, क्या ऐसा हो जाएगा, जैसा कि कहा जा रहा है? अभी तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही आकलन करके आशंका और संभावना ही व्यक्त कर रहे हैं। दोनों केआकलन केपीछे तथ्य होंगे, जिनकेआधार पर दोनों भविष्य की तस्वीर खींच रहे हैं, लेकिन भविष्य की जैसी तस्वीर बनाई जा रही है वह आने वाले दिनों में वैसी ही हो, इसकी कोई गांरटी नहीं है।
सरकार का आकलन सही हो सकता है, क्योेंकि वह वर्तमान को देखते हुए फैसला कर रही है। (केवल एफडीआई के मामले में) हमारी अर्थव्यवस्था की विकास की गति धीमी हो गई है ऐसे में उसमें पूंजी लगाने की आवश्यक्ता है लेकिन सरकार केपास पूंजी नहीं है। देश केपूंजीपतियों का निवेश भी पर्याप्त नहीं है या वह विदेशी पूंजी का साथ चाहते हैं। ऐसे में सरकार को रिटेल में विदेशी पूंजी के लिए रास्ता खोलना पड़ रहा है। अब यह विदेशी पूंजी आएगी तो कितनी? और अर्थव्यवस्था को किस रूप में लाभ पहुंचाएगी, इसे आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन फिलहाल इसके माध्यम से एक बेहतर रास्ता दिखता है अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए।
विपक्ष की आशंका में इसलिए ज्यादा दम नजर नहीं आता, क्योंकि आने वाले वर्षाें में न केवल समाज को बदलना है बल्कि उसकी व्यवस्था को भी बदलना है। भारत में आज खुदरा बाजार का जैसा स्वरुप है, आने वाले वर्षों में उसका स्वरूप ऐसा ही कदापि नहीं रहने वाला। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भूत में हमारी ऐसी कई सामाजिक व्यवस्थाओं का स्वरूप बदला है। एक समय था कि गांवों में नाई, पंडित, धोबी, कहार, कुम्हार, हलवाहा और केवट आदि काम के बदले अनाज लिया करते थे अपने यजमानों से। लेकिन आज ऐसा नहीं है। धोबी, कहार, कुम्हार और हलवाहा जैसी व्यवस्थाओं का आज अस्तित्व नहीं रह गया है। इन धंधों से जुड़े लोगों को आज आजीविका के लिए दूसरा काम करना पड़ रहा है। इसी तरह एक समय था कि किसानों केखेतों में काम करने वाले कामगार अपने श्रम के बदले अनाज लेते थे लेकिन आज वह नकद लेते हैं।
किसानों का भी स्वरुप बदला है। देश के कुछ राज्यों को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकतर राज्यों में अधिकतर किसान सीमांत जोत वाले हैं। आने वाले दिनों में इनमें से अधिकतर सीमांत से भूमिहीन होकर कामगार हो जाएंगे। जनसंख्या के घनत्व ने खेती की जमीनों पर ऐसा दबाव डाला है कि खेती किसी के लिए जीने का एक मात्र साधन नहीं रह गई है। खेती में हो रहे इस परिवर्तन को समझना होगा। आज भले ही हमारे देश की अधिकतर आबादी गांवों में रह रही है। लेकिन आने वाले दिनों में ऐसा ही रहेगा यह मान लेना कतई उचित नहीं होगा। गांवों से शहरों की तरफ जिस तेजी से युवाओं का पलायन हो रहा है और शहरों में जिस तरह से जनसंख्या का दवाब बढ़ रहा है, उससे शहरीकरण तेजी से बढ़ेगा। गांव खत्म होकर शहर और कस्बों में समा जाएंगे। तब न ऐसा समाज रहेगा न ही ऐसी कोई व्यवस्था। सभी व्यवस्थाएं और समाज समयानुकूल और आवश्यकतानुकूल बदल जाएंगे।
आज शहरों की युवा पीढ़ी मॉल में घूमना और खरीदारी करना पसंद करती है। यह वह पीढ़ी है जो विदेश में पढ़ाई करना, नौकरी करना और वहां रहने के लिए लालायित रहती है। यही नहीं देश में भी उसे विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी करना अधिक बेहतर और सुविधाजनक लगता है। युवा पीढ़ी की यह पसंद और रुचियां यूं ही नहीं बनी होंगी। यह कहना कि उनमें विवेक नहीं है, निरा बेवकूफी होगी। ऐसे मे रिटेल में एफडीआई का विरोध करने वाले और उसका समर्थन करने वाले कहां खड़े हैं यह समझना कोई मुश्किल काम नहीं है।
रही बात केंद्र सरकार से तृणमूल कांग्रेस का समर्थन वापस लेने का तो यह देश केभले के लिए बहुत पहले हो जाना चाहिए था। भारतीय रेल का जिस तरह से बंटाधार ममता बनर्जी और उनके नेताओं ने किया है वैसा ही बंटाधार वह पश्चिम बंगाल का भी करेंगी और कर रही हैं। आज पश्चिम बंगाल वामपंथ की अंधेरी सुरंग से निकलकर ममता बनर्जी नामक अंतहीन छोर वाली उससे कहीं अंधेरी सुरंग में फंस गया है। शुक्र है कि भारतीय रेल इससे निकल गई है। रही बात भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों की तो वह हमेशा दिशाहीन रहे हैं और आगे भी रहेंगे। उनकी आज की उछल-कूद का भविष्य में क्या लाभ होगा इसे वह अच्छी तरह से जानते हैं। यह बात तो दावे से कही जा सकती है कि सत्ता में आने के बाद यह लोग भी वही करेंगे जो आज की सत्तारूढ सरकार कर रही है। आम जनता को इंतजार करना चाहिए इस बार के लोकसभा चुनाव केबाद के वक्त का। उस समय केलिए जो हास्यास्पद नाटक का मंचन होगा उसकी स्क्रिप्ट फिलहाल लिखी जा रही है।

परिवर्तन लाजमी है तो डरना क्यों?


मानव सभ्यता अंतरविरोधों के परमाणु बम जैसी है। इसके अंतरविरोध परिवर्तनशील बनाकर इसे आगे बढ़ाते हैं तो यही इसका विनाश भी करते हैं। मानव जाति का इतिहास गवाह है कि भूत में कई सभ्यताएं तबाह हो गईं जिनके मलबे से खाद-पानी लेकर नई सभ्यताओं ने जन्म लिया और फली-फूली हैं। यही वजह है कि मानव भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है। उसकी अधिकतर योजनाएं बेहतर भविष्य के लिए होती हैं। लेकिन हर आदमी, हर समाज और हर सभ्यता व संस्कृति हमेशा बेहतर नहीं साबित होती। अक्सर इंसानी अनुमान धरे केधरे रह जाते हैं और भविष्य कुछ का कुछ हो जाता है।
वामपंथी चिंतक कार्ल मार्क्स का आकलन था कि पूंजीवादी व्यवस्था अपनी तबाही के लिए खुद ही रास्ते बनाती है। यही वजह है कि एक दिन यह व्यवस्था तबाह हो जाएगी और इसके स्थान पर नई व्यवस्था सामने आएगी। नई व्यवस्था क्या होगी इसकी भी मार्क्स ने कल्पना की और बताया कि वह साम्यवादी व्यवस्था होगी। लेकिन ऐसा हुआ क्या? आज लगभग पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था है। सोवियत रूस जैसे देशों में साम्यवादी व्यवस्था आई भी तो वह पूंजीवादी व्यवस्था से पहले ही ढह हो गई। चीन साम्यवाद के रूप में पूंजीवाद को ही बढ़ावा दे रहा है। (उत्तरकोरिया और क्यूबा आदि अपवाद हो सकते हैं) इस तरह मार्क्स का आकलन अभी तक पूरी तरह सही साबित नहीं हो पाया है। इसी तरह भवष्यि के बारे में किसी का भी आकलन सही साबित हो यह जरूरी नहीं है। आने वाले वर्षाें में मार्क्स का कथन सत्य साबित हो जाए इस पर आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रकृति, मानव, समाज और सभ्यता एवं संस्कृति का बदलाव लाजमी है। इसी के साथ आज जो व्यवस्था है आने वाले वर्षों में उसका बदलना भी अनिवार्य है। आज की पूंजीवादी व्यवस्था आने वाले वर्षों में ऐसी ही रहेगी इसकी कोेई गारंटी नहीं है। आने वाले वर्षों में हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी रहेगी इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। किसी भी देश का मानाव समाज नहीं बदलेगा और संस्कृति भी इसी तरह ही रहेगी इसे भी आज ही सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।
बदलाव तय है। परिवर्तन तय है तो इससे डर कैसा? दरअसल, डर बदलाव या परिवर्तन से नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रिया से लगता है। आने वाले परिणामों से लगता है। मसलन, एक डर यह है कि एक दिन हिंदी भाषा खत्म हो जाएगी। यदि हिंदी भाषा खत्म हो जाएगी तो क्या हिंदी भाषी समाज गूंगा हो जाएगा? जवाब नहीं ही है। हिंदी भाषी समाज अपनी सुविधानुसार नई भाषा तैयार कर लेगा। प्रकृति, पाली, संस्कृत आदि भाषाओं से हमें यही सबक मिलता है। यदि हिंदी भाषी समाज दूसरी भाषा नहीं तैयार कर पाया तो भाषा ही नहीं एक सभ्यता का अंत हो जाएगा।
आजकल देश में किराना बाजार (रिटेल) में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश (एफडीआई) का बहुत शोर है। एक तरफ सरकार है, जो कह रही है कि पैसा पेड़ों पर नहीं लगता। यदि देश की अर्थव्यवस्था का विकास चाहिए तो एफडीआई जरूरी है। दूसरी तरफ विपक्ष है, जो कह रहा है कि इससे देश बरबाद हो जाएगा। देश गुलाम हो जाएगा। किसान बरबाद हो जाएंगे। देश के करोड़ों खुदरा व्यापारी तबाह हो जाएंगे। दरअसल, क्या ऐसा हो जाएगा, जैसा कि कहा जा रहा है? अभी तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही आकलन करके आशंका और संभावना ही व्यक्त कर रहे हैं। दोनों केआकलन केपीछे तथ्य होंगे, जिनकेआधार पर दोनों भविष्य की तस्वीर खींच रहे हैं, लेकिन भविष्य की जैसी तस्वीर बनाई जा रही है वह आने वाले दिनों में वैसी ही हो, इसकी कोई गांरटी नहीं है।
सरकार का आकलन सही हो सकता है, क्योेंकि वह वर्तमान को देखते हुए फैसला कर रही है। (केवल एफडीआई के मामले में) हमारी अर्थव्यवस्था की विकास की गति धीमी हो गई है ऐसे में उसमें पूंजी लगाने की आवश्यक्ता है लेकिन सरकार केपास पूंजी नहीं है। देश केपूंजीपतियों का निवेश भी पर्याप्त नहीं है या वह विदेशी पूंजी का साथ चाहते हैं। ऐसे में सरकार को रिटेल में विदेशी पूंजी के लिए रास्ता खोलना पड़ रहा है। अब यह विदेशी पूंजी आएगी तो कितनी? और अर्थव्यवस्था को किस रूप में लाभ पहुंचाएगी, इसे आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन फिलहाल इसके माध्यम से एक बेहतर रास्ता दिखता है अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए।
विपक्ष की आशंका में इसलिए ज्यादा दम नजर नहीं आता, क्योंकि आने वाले वर्षाें में न केवल समाज को बदलना है बल्कि उसकी व्यवस्था को भी बदलना है। भारत में आज खुदरा बाजार का जैसा स्वरुप है, आने वाले वर्षों में उसका स्वरूप ऐसा ही कदापि नहीं रहने वाला। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भूत में हमारी ऐसी कई सामाजिक व्यवस्थाओं का स्वरूप बदला है। एक समय था कि गांवों में नाई, पंडित, धोबी, कहार, कुम्हार, हलवाहा और केवट आदि काम के बदले अनाज लिया करते थे अपने यजमानों से। लेकिन आज ऐसा नहीं है। धोबी, कहार, कुम्हार और हलवाहा जैसी व्यवस्थाओं का आज अस्तित्व नहीं रह गया है। इन धंधों से जुड़े लोगों को आज आजीविका के लिए दूसरा काम करना पड़ रहा है। इसी तरह एक समय था कि किसानों केखेतों में काम करने वाले कामगार अपने श्रम के बदले अनाज लेते थे लेकिन आज वह नकद लेते हैं।
किसानों का भी स्वरुप बदला है। देश के कुछ राज्यों को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकतर राज्यों में अधिकतर किसान सीमांत जोत वाले हैं। आने वाले दिनों में इनमें से अधिकतर सीमांत से भूमिहीन होकर कामगार हो जाएंगे। जनसंख्या के घनत्व ने खेती की जमीनों पर ऐसा दबाव डाला है कि खेती किसी के लिए जीने का एक मात्र साधन नहीं रह गई है। खेती में हो रहे इस परिवर्तन को समझना होगा। आज भले ही हमारे देश की अधिकतर आबादी गांवों में रह रही है। लेकिन आने वाले दिनों में ऐसा ही रहेगा यह मान लेना कतई उचित नहीं होगा। गांवों से शहरों की तरफ जिस तेजी से युवाओं का पलायन हो रहा है और शहरों में जिस तरह से जनसंख्या का दवाब बढ़ रहा है, उससे शहरीकरण तेजी से बढ़ेगा। गांव खत्म होकर शहर और कस्बों में समा जाएंगे। तब न ऐसा समाज रहेगा न ही ऐसी कोई व्यवस्था। सभी व्यवस्थाएं और समाज समयानुकूल और आवश्यकतानुकूल बदल जाएंगे।
आज शहरों की युवा पीढ़ी मॉल में घूमना और खरीदारी करना पसंद करती है। यह वह पीढ़ी है जो विदेश में पढ़ाई करना, नौकरी करना और वहां रहने के लिए लालायित रहती है। यही नहीं देश में भी उसे विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी करना अधिक बेहतर और सुविधाजनक लगता है। युवा पीढ़ी की यह पसंद और रुचियां यूं ही नहीं बनी होंगी। यह कहना कि उनमें विवेक नहीं है, निरा बेवकूफी होगी। ऐसे मे रिटेल में एफडीआई का विरोध करने वाले और उसका समर्थन करने वाले कहां खड़े हैं यह समझना कोई मुश्किल काम नहीं है।
रही बात केंद्र सरकार से तृणमूल कांग्रेस का समर्थन वापस लेने का तो यह देश केभले के लिए बहुत पहले हो जाना चाहिए था। भारतीय रेल का जिस तरह से बंटाधार ममता बनर्जी और उनके नेताओं ने किया है वैसा ही बंटाधार वह पश्चिम बंगाल का भी करेंगी और कर रही हैं। आज पश्चिम बंगाल वामपंथ की अंधेरी सुरंग से निकलकर ममता बनर्जी नामक अंतहीन छोर वाली उससे कहीं अंधेरी सुरंग में फंस गया है। शुक्र है कि भारतीय रेल इससे निकल गई है। रही बात भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों की तो वह हमेशा दिशाहीन रहे हैं और आगे भी रहेंगे। उनकी आज की उछल-कूद का भविष्य में क्या लाभ होगा इसे वह अच्छी तरह से जानते हैं। यह बात तो दावे से कही जा सकती है कि सत्ता में आने के बाद यह लोग भी वही करेंगे जो आज की सत्तारूढ सरकार कर रही है। आम जनता को इंतजार करना चाहिए इस बार के लोकसभा चुनाव केबाद के वक्त का। उस समय केलिए जो हास्यास्पद नाटक का मंचन होगा उसकी स्क्रिप्ट फिलहाल लिखी जा रही है।

शनिवार, 30 जून 2012

ख्वाजा, ओ मेरे पीर .......




शिवमूर्ति जी से मेरा पहला परिचय उनकी कहानी तिरिया चरित्तर के माध्यम से हुआ। जिस समय इस कहानी को पढ़ा उस समय साहित्य के क्षेत्र में मेरा प्रवेश हुआ ही था। इस कहानी ने मुझे झकझोर कर रख दिया। कई दिनों तक कहानी के चरित्र दिमाग में चलचित्र की तरह चलते रहे। अंदर से बेचैनी भरा सवाल उठता कि क्या ऐसे भी लोग होते हैं? गांव में मैंने ऐसे बहुत सारे चेहरे देखे थे। उनके बारे में तरह-तरह की बातें भी सुन रखी थी लेकिन वे चेहरे इतने क्रूर और भयावह होते हैं इसका एहसास और जानकारी पहली बार इस कहानी से मिली थी।
कहानियों के प्रति लगाव मुझे स्कूल के दिनों से ही था। जहां तक मुझे याद पड़ता है स्कूल की हिंदी की किताब में छपी कोई भी कहानी मैं सबसे पहले पढ़ जाता था। किताब खरीदने के बाद मेरी निगाहें यदि उसमें कुछ खोजतीं थीं तो केवल कहानी। कविताएं भी आकर्षित करती थी लेकिन अधिकतर समझ में नहीं आती थीं इसलिए उन्हें पढ़ने में रुचि नहीं होती थी। यही हाल अब भी है। अब तो कहानियां भी आकर्षित नहीं करती। वजह चाहे जो भी लेकिन हाल फिलहाल में जो कहानियां लिखी जा रही हैं वे न तो पाठकों को रस देती हैं न ही ज्ञान। न ही बेचैन करती हैं और न ही कुछ सोचने के लिए मजबूर करती हैं। पाठक को उसमें अपने आसपास का समाज भी नहीं दिखता। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अब की कहानी बहुत बौद्धिक और बहुत ही बनावटी हो गई हैं। भाषाई चमात्कार चाहे जितना हो लेकिन अपनी बोझिलता और समाज तथा आदमी के सुख-दुख, दर्द और समस्या से दूर होने के कारण वह बोर करती हैं। कहानियों का सतहीपन उन्हें पढ़ने के बाद फिर कोई कहानी पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं करता।
लेकिन शिवमूर्ति जी की कहानियों के साथ ऐसा नहीं है। तिरिया चरित्तर पढ़ने के बाद उनकी कहानी जहां भी प्रकाशित हुई और वह पत्रिका मुझे मिल सकी तो मैंने उसे पढ़ा जरूर है। इसकी एक ही वजह है कि वह अपने समाज और भाषा से जुड़े लेखक हैं। वह शहर में रहकर भले ही अफसरी करते रहे लेकिन कहानी उन्होंने जब भी लिखी उसमें गांव पूरी समग्रता और संपूर्णता में जीवंत हो गया। प्रत्येक चरित्र अपने मूल स्वाभाव में पाठक केसामने खड़ा हो जाता है। चरित्र की सजीवता ऐसी की पाठक को लगता है कि वह कोई फिल्म देख रहा है। पात्र पर्दे पर बोल रहा है। सच कहूं तो पर्दे पर बोलने वाला पात्र उनकी कहानियों से अधिक सजीव नहीं होता। इसका पता मुझे तब चला जब मैंने उनकी तिरिया चरित्तर पढ़ने के बाद उस पर बनी फिल्म दिल्ली में देखी। फिल्म मेरेआंखों के सामने चल रही थी लेकिन मैं उसे कहानी के माध्यम से देख रहा था। चरित्रों की भाव भंगिमा और उनकी अदाएं जब अपनी कल्पना से नहीं मिलीं तो लगा कि फिल्म निर्देशक लेखक की भवाना को पकड़ने में चूक गया है। फिल्म के कई दृश्य जब कहानी से मेल नहीं खाए तो खासी निराशा हुई। यह फिल्म की अपनी सीमा हो सकती है लेकिन कहने का भाव यह है कि शिवमूर्ति की कहानी केचरित्र फिल्मी पात्रों से भी अधिक सजीव होते हैं। बिल्कुल मेरे और आपकी तरह।
रवींद्र कालिया जी के संपादन में निकलने वाली भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका नया ज्ञानोदय में उनका उपन्यास आखिरी छलांग छपा तो उसे एक बैठक में पढ़ गया। शिवमूूूर्ति जी से बहुत सारी उम्मीदें थीं। किसानों पर आधारित होने के उस रचना के माध्यम से गांव की सैर करने की तमन्ना थी। इसलिए उपन्यास पढ़ना आरंभ किया तो खत्म करने के बाद ही दम लिया।
यह वर्ष 2007 के नवंबर-दिसंबर की बात होगी। उस समय मैं अपना नया-नया ब्लॉग बनाया था समालोचना। इसे बनाने के पीछे मकसद था कि काम की व्यस्तता के बावजूद यदि कुछ पढ़ पाया तो उसके बारे में इस पर लिखा करूंगा। चूंकि नई-नई दुनिया की चाभी हाथ लगी थी तो उत्साह भी गजब का था। अगले ही दिन शिवमूर्ति जी के उपन्यास आखिरी छलांग की समीक्षा कर डाली और उसे समालोचना पर पोस्ट कर दिया। इसके बाद एक एसएमएस कालिया जी को और एक शिवमूर्ति जी को कर दिया कि आपके उपन्यास की समीक्षा मैंने लिखी और उसे समालोचना ब्लॉग पर पोस्ट की है चाहें तो पढ़ सकते हैं।
उपान्यास की समीक्षा का मूल भाव यह था कि मेरे प्रिय लेखक ने मुझे निराश किया है। हालांकि उपन्यास में गांव वैसा ही है और चरित्र भी। समस्याएं भी वैसे ही हैं। लेकिन कंटेंट मुझे बिखरा लगा और साफ-साफ लिख दिया कि शिवमूर्ति जैसे कथाकार से इससे बेहतर रचना की उम्मीद थी।
मुझे आश्चर्य तब हुआ जब एक दिन अचानक शिवमूर्ति जी का फोन आ गया। उस समय मैं एक शवयात्रा में शामिल था। ऐसे मौकों पर मोबाइल पर किसी गाने की धुन का बजना कैसा लगा होगा यह मैं आप सब पर छोड़ देता हूं। लेकिन चूंकि मैंने शिवमूर्ति जी का नंबर सेव कर रखा था तो उनका नाम देखने के बाद उसे काट भी नहीं सकता था। मोबाइल को आन करकेमैं रुक गया। औपचारिक बातचीत के बाद शिवमूर्ति जी ने यही कहा था कि मैं आपकी बात से सहमत हूं। मैं इस उपन्यास को फिर से लिखने जा रहा हूं, तो आप कुछ सुझाव देंगे मैं उसे शामिल कर लूंगा। इसके बाद मेरी उनसे बातचीत नहीं हुई। रही बात सुझाव की तो मैंने अपने को इस लायक नहीं पाया कि उन्हें कोई सुझाव देता। रही बात उनके उपन्यास पर लिखने की तो उस समय मैंने एक पाठक के अंदाज में जो उचित लगा वह लिख मारा था। चूंकि छपने के लिए किसी संपादक की जरूरत नहीं थी सो वह छप भी गया। (ब्लॉग पर पोस्ट हो गया) इसके बाद उनका यह उपन्यास किताब के रूप में प्रकाशित हुआ लेकिन मैं उसे नहीं पढ़ पाया। हालांकि मुझे पूरी उम्मीद है कि उन्होंने मेरा ब्लाग पढ़ने के बाद उसमें उठाई गई कमियों की तरफ जरूर ध्यान दिया होगा।
शिवमूर्ति जी की रचनाओं में जो चीजें मुझे प्रभावित करती हैं उनकेबारे में चर्चा करता हूं। शिवमूर्ति जी की कहानी तर्पण के बारे में एक समीक्षक की टिप्पणी है कि तर्पण भारतीय समाज में सहस्राब्दियों से शोषित, दलित और उत्पीड़ित समुदाय के प्रतिरोध एवं परिवर्तन की कथा है। इसमें एक तरफ कई-कई हजार वर्षों के दु:ख, अभाव और अत्याचार का सनातन यथार्थ है तो दूसरी तरफ दलितों के स्वप्न, संघर्ष और मुक्ति चेतना की नई वास्तविकता। तर्पण में न तो दलित जीवन के चित्रण में भोगे गये यथार्थ की अतिशय भावुकता और अहंकार है, न ही अनुभव का अभाव। उत्कृष्ट रचनाशीलता के समस्त जरूरी उपकरणों से सम्पन्न तर्पण दलित यथार्थ को अचूक दृष्टिसम्पन्नता के साथ अभिव्यक्त करता है। शिवमूर्ति हिंदू समाज की वर्णाश्रम व्यवस्था के घोर विखंडन का महासत्य प्रकट करते हैं। इस पृष्ठभूमि पर इतनी बेधकता, दक्षता और ईमान के साथ अन्य कोई रचना दुर्लभ है। समकालीन कथा साहित्य में शिवमूर्ति ग्रामीण वास्तविकता के सर्वाधिक समर्थ और विश्वनीय लेखकों में हैं। तर्पण इनकी क्षमताओं का शिखर है। रजपत्ती, भाईजी, मालकिन, धरमू पंडित जैसे अनेक चरित्रों के साथ अवध का एक गांव अपनी पूरी सामाजिक, भौगोलिक संरचना के साथ यहां उपस्थित है। गांव के लोग-बाग, प्रकृति, रीति-रिवाज, बोली-बानी-सब कुछ-शिवमूर्ति के जादू से जीवित-जाग्रत हो उठे हैं। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि उत्तर भारत का गंवई अवध यहां धड़क रहा है।
शिवमूर्ति जी केबारे में लिखी गई उपरोक्त बातों से मैं भी पूरी तरह से सहमत हूं। उनकी यही खासियत मुझे भी बहुत प्रभावित करती है। यही वजह है कि उनके बारे में लिखी गई उक्त पंक्तियां मुझे बहुत अच्छी लगीं। सच कहूं तो मैं भी अवध क्षेत्र का हूं। यही नहीं सुल्तानपुर जिले का वासी हूं। (एक बार ऐसे ही शिवमूर्ति जी से बात हो रही थी। लमही में छपी मेरी कहानी पढ़ने के बाद उन्होंने फोन किया था। बातों-बातों में जब उन्हें पता चला कि मैं भी सुल्तानपुर का हूं तो उन्होंने कहा था कि सुल्तानपुर से सात-आठ कहानीकार तो इस समय सक्रिय रुप से कहानियां लिख रहे हैं। ) इस कारण मेरी भी बोली-बानी शिवमूर्ति जी से मिलती-जुलती है। शायद यही वजह है कि जब उनके पात्र अवधी बोलते हैं तो अंदर से एक अजीब से आनंद की अनुभूति होती है। इसे क्षेत्रीयता की मानसिक गुलामी भी कह सकते हैं लेकिन अपनी बोली-बानी और मिट्टी की सुगंध को मरते दम तक कोई भी भुला नहीं सकता। जीविका के लिए देश भर में भटकने के बावजूद हमारे जैसे लोगों की हालत उस पंक्षी की तरह है जो समुद्री जहाज पर है और बार-बार उड़ने के बाद भी थक हार का उसी जहाज पर आता है। उस पंक्षी की मजबूरी है कि उसे कहीं और ठिकाना नहीं मिलता लेकिन हमारे जैसे लोगों की कोई मजबूरी नहीं होती। हम आसानी से किसी शहर में बस सकते हैं और उसकी बोली-बानी में रचबस सकते हैं, और अपने गांव को भूल सकते हैं। लेकिन दिल और दिमाग में रची-बसी तस्वीरों, लोग, बोली-बानी और मिट्टी की खुशबू को नहीं भुला सकते।
(हालांकि काम के सिलसिले में ही सही दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी यूपी और उत्तराखंड में रहते हुए मैं यहां की भी बोली-बानी और भाषा के करीब रहा हूं। आज मुझे जितनी प्रिय और मधुर अवधी लगती है उतनी ही हरियाणवी, गढ़वाली, ब्रज और पंजाबी भी। जहां-जहां भी मैं रहा आज यदि वहां का कोई वांशिदा मिलता है तो टूटी-फूटी ही सही लेकिन उसकी बोली-बानी और भाषा में बात करने के आनंद से मैं खुद को वंचित नहीं रख पाता। )
यही वजह है कि शिवमूर्ति जी का आखिरी छलांग पढ़ते हुए मैं कई जगहों पर भाुवक हुआ। आंखों से आंसू भी निकले। अपने मित्र अमरीक सिंह से इसका जिक्र भी किया। बल्कि कई अवधी शब्दों का अर्थ भी अमरीक को बताया। यह भी कहा कि उपन्यास में जिन शब्दों पर तुम्हारे जैसे लोगों को दिक्कत होती होगी उन्हीं शब्दों पर मेरे जैसे लोग लहालोट हो जाते होंगे। इस पर अमरीक की प्रतिक्रिया थी कि शिवमूर्ति जी की यही तो खासियत है। आपको बता दें कि अमरीक सिंह सिख हैं और हरियाणा के सिरसा में पले बढ़े हैं लेकिन सांस्कृतिक रूप से वह पंजाब के करीब हैं। यही वजह है कि उनका कार्यक्षेत्र अधिकतर समय पंजाब रहा। पंजाबी साहित्य गहरी समझ रखने के साथ ही वह वह हिंदी साहित्य के खास करके उपन्यास विघा के घनघोर और अराजक किस्म के पाठक हैं।
शिवमूर्ति जी की कहानी की भाषा और उसका चित्रण का कमाल तर्पण कहानी के इस अंश में देखिए। -----दो बड़े-बड़े गन्ने कंधे पर रखे और कोंछ में पांच किलो धान की मजदूरी संभाले चलती हुई रजपत्ती का पैर इलाके के नंबरी मेंड़कटा
’ नत्थूसिंह की मेंड़ पर दो बार फिसला। कोंछ के उभार और वजन के चलते गर्भवती स्त्री की नकल करते हुए वह दो बार मुस्कराई। आज की मजदूरी के अलावा चौधराइन ने उसे दो बड़े गन्ने घेलवा में पकड़ा दिए।(मेंड़कटा और घेलवा जैसे शब्द कहानी के मर्म को तो बढ़ाते ही हैं कहानी को विस्तार देकर उसके फलक को और विस्तृत कर देते हैं। मेंड़कटा शब्द से एक ऐसा चरित्र जेहन में उभरता है, जिसके बारे में कहानी में जिक्र भी नहीं है लेकिन वह अपने पूरे वजूद के साथ रचना में मौजूद हो जाता है। इसी तरह घेलवा शब्द से एक संस्कृति की झलक कहानी में पैठ जाती। इन शब्दों के अर्थ को समझने वाला इस चरित्र और संस्कृति के आनंद में डूब जाता है।)
जब से इलाके में मजदूरी बढ़ाने का आंदोलन हुआ, खेतिहर मजदूरों को किसान खुश रखना चाहते हैं। पता नहीं किस बात पर नाराज होकर कब काम का
बाईकाट’ कर दें।इस गांव के ठाकुरों-बाभनों को अब मनमाफिक मजदूर कम मिलते हैं। पंद्रह-सोलह घरों की चमरौटी ( इस एक शब्द से एक गांव नजरों के सामने घूम जाता है, जिसमें नाना प्रकार के चरित्र संघर्ष करते हुए जिंदगी जीने की जद्दोजहद में लगे होते हैं। ) में दो तीन घर ही इनकी मजदूरी करते हैं। बाकी औरतें ज्यादातर आसपास के गांवों में मध्यवर्ती जाति के किसानों के खेत में काम करना पसंद करती हैं और पुरुष शहर जाकर दिहाड़ी करना। चौधराइन औरतों को खुश रखना जानती हैं। कभी गन्ना, आलू या शकरकंद काघेलवा’ देकर, कभी अपने टीवी में महाभारत’ या जै हनुमान’ दिखाकर।शिवमूर्ति जी की रचनाएं ऐसे चित्रणों से भरी पड़ी हैं। अमूमन कहानी या उपन्यास में विवरण पाठकों को बोर करते हैं लेकिन शिवमूर्ति जी की रचनाओं में विवरण इतने चित्रात्मक होते हैं कि पाठक उसमें खो सा जाता है। देखिए तर्पण कहानी का यह अंश।
- नरम पोल्ले सिर हिलाकर खोंटने का न्यौता दे रहे हैं। लाही के खेत में घुटने मोड़े सिर छिपाए देर से इंतजार करता धरमू पंडित का बेटा चंदर रह रहकर ऊंट की तरह गर्दन उठाकर देखता है। दूर खेतों की मेंड़ पर चली आ रही है रजपतिया। अब पहुंची उसके खेतों की मेंड़ पर अभी अगर वह उसके खेत से
कड़कड़ा’ कर दो गन्ने तोड़ ले तो रंगे हाथ पकड़ने का कितना बढ़िया चानस’ हाथ लग जाए। फिर ना-नुकुर करने की हिम्मत नहीं पड़ सकती.....शिवमूर्ति जी का जीवन और उनका अनुभव काफी संघर्षों वाला है। उनकी रचनाओं के पात्र भी संघर्ष करते रहते हैं। परिस्थितियां चाहे जैसे हो लेकिन अधिकतर पात्र संपूर्ण जीजिविषा वाले होते हैं। लड़ते हैं थकते हैं गिरते हैं फिर उठ खड़े होते हैं। अंत में जो हार जाते हैं वे भी याद रह जाते हैं, क्योंकि वे भी उपरोक्त गुणों से लबरेज होते हैं। वे हार कर भी जीतते हैं। उनकी हार में ही जीत छिपी होती है। कसाईबाड़ा के शनिश्चरी और अधरंगी को कौन भूल सकता है। ये पात्र हार कर भी लोगों को कुछ करने की प्रेरणा दे जाते हैं। इनकी हार निराश नहीं बल्कि उत्साहित करती है और जोश व प्रोत्साहन देती है। हाल ही में तद्भव में प्रकाशित उनकी कहानी ख्वाजा, ओ मेरे पीर के पात्र मामा और मामी को ही जीजिए। जिंदगी जीने में दोनों असफल हैं लेकिन मकसद जीने में दोनों सफल। उनकी असफलता में उनकी जीवटता छिपी है। भले ही उनका दांपत्य जीवन सुखी नहीं रहा लेकिन जिस तरह से उन्होंने जिया वह भी कितने लोग जी पाते हैं? ऐसा जीवन जीने के लिए हौसले की दरकार होती है। ऐसा हौसला कितनी औरतों में होता है कि वह रात में पति से मिलने के लिए दूसरे गांव से आती है? यह चाह केवल यौन सुख की चाह नहीं है। न ही केवल बच्चा पैदा करने की इच्छा से उपजी उत्कंठा है। यह एक स्त्री का समपर्ण है तो उसकी समाज को चुनौती है। यह जताने की मंशा भी है कि औरत कमजोर नहीं होती। सच पूछिये तो मामी का चरित्र अद्भुत है। हालांकि गांवों में ऐसी औरतों के लिए तरह-तरह की कहानियां फैल जाती हैं लेकिन मामी के बारे में ऐसा कुछ नहीं होता तो शायद इसलिए कि वह पूरी पुरुष सत्ता को चुनौती देती हैं। न केवल चुनौती देती हैं बल्कि करके दिखाती हैं।
शिवमूर्ति जी के बारे में किसी ने ठीक ही लिखा है कि -शिवमूर्ति ब्योरों को सरलता से परोसने के लिए जाने जाते हैं और रूला जाते हैं। ग्रामीण परिवेश को, हिंदी कहानी में, रेणु से वह बहुत आगे ले जाते हैं। शायद इसीलिए उनकी कहानियों का अनुवाद भारतीय भाषाओं से लेकर अंग्रेजी और उर्दू तक में उपलब्ध है।

रविवार, 25 मार्च 2012

उनकी नजाकत पर आंकड़ों की नफासत तो देखिए

- ओमप्रकाश तिवारी
आंकड़े बेजुबान होते हैं लेकिन बहुत कुछ कहते हैं। बेदर्द लगते हैं पर संवेदनशील होते हैं। तस्वीर नहीं होते लेकिन तस्वीर बनाते हैं। आईना नहीं होते लेकिन तस्वीर दिखाते हैं। कलाकार नहीं होते लेकिन कलाकारों के औजार होते हैं। बेजान दिखते हैं लेकिन उनमें कई सच धड़कता है। चतुर सुजान अपना सच उनके माध्यम से छिपाते हैं और भ्रम फैलाते हैं लेकिन आंकड़ों की अदा देखिए कि वह सच ही कहते हैं और सच ही दिखाते हैं।
योजना आयोग का कहना है कि देश से गरीबी घट रही है। करोड़ों बिलबिलाते और तिलतिल कर मरने वालों के देश में सचमुच यह खुश होने वाली खबर है। क्या यह सच है या हकीकत पर खुशफहमी का परदा डालने की नादान होशियारी है। योजना आयोग कहता है कि यदि कोई शहरी प्रतिदिन 28 रुपये 65 पैसे खर्च करता है तो वह गरीब नहीं है। जबकि गांवों में 22 रुपये 42 पैसे खर्च करने वाले को गरीब नहीं कहा जा सकता। इस तरह महीने में 859 रुपये 60 पैसे खर्च करने वाला शहरी और 672 रुपये 80 पैसे खर्च करने वाला ग्रामीण गरीब की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
आप सरकार हैं। कोई भी श्रेणी बनाएं और उसमें डाल दें। गरीब आदमी क्या कर सकता है? उसे तो यह भी नहीं पता कि उसके लिए आप कितने चिंतित हैं। अपनी कारीगरी से उसके कुनबे को ही कम कर दे रहे हैं। किसी गरीब को यदि यह पता चले तो वह जरूर पूछेगा कि जरा एक दिन इतने पैसे में जिंदगी जी कर दिखाइए जनाब। कसम से, मां से नानी तक की याद न आए जाए तो कहना। माफ कीजिएगा, हत्या खंजर, बंदूक या बम से ही नहीं की जाती। करोड़ों लोगों के अस्तित्व को जिस नजाकत-नफासत से आपने इनकार कर दिया, कत्ल तो उसे भी कहते हैं। फर्क वश इतना है कि हत्या करने वाले सजा पाते हैं और आप ईनाम के हकदार हो जाते हैं।
आप कहते हैं कि पिछले पांच वर्षों में गरीबी घटी है। वर्ष 2004-05 के मुकाबले वर्ष 2010-11 में गरीबी 7.3 प्रतिशत कम हो गई है। वर्ष 2010-11 देश में गरीबी की दर 29.8 फीसदी रह गई, जबकि पांच साल पहले यह 37.2 फीसदी थी। अब देश में करीब 34.37 करोड़ लोग गरीब हैं, जबकि 2004-05 में 40.72 करोड़ लोग गरीब थे।
सच क्या है आप बेहतर जानते हैं। कोई भी संवेदनशील, समझदार और चिंतनशील इनसान इन आंकड़ों पर विश्वास नहीं करेगा। वैसे भी ये आंकड़े आपकी नीयत को दर्शाते और बताते हैं। हकीकत तो यह है कि देश की करीब 70 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीने को मजबूर है।
आप कहते हैं कि शहर में करीब 860 रुपये प्रतिमाह कमाने वाला गरीब नहीं है। हिसाब लगाकर देखिए, दस हजार रुपये प्रतिमाह कमाने वाला भी ठीक से गुजारा नहीं कर पा रहा है। किसी भी शहर में हजार रुपये प्रतिमाह से कम का एक कमरा किराये पर नहीं मिलता। (इस एक हजार वाले भी आप नहीं रह सकते) यदि किसी व्यक्ति को शहर में किराये का कमरा लेकर रहना है तो वह 860 रुपये में कैसे रहेगा? उसकी कमाई तो कमरे के किराये को भी पूरा नहीं करती? फिर खाएगा क्या और पहनेगा क्या? आपको यकीन नहीं होगा लेकिन ऐेसे हालात में देश में करोड़ों लोग रह रहे हैं।
मान लो यदि किसी का शहर में अपना घर है, तो क्या वह अपने परिवार का भरण-पोषण इतने पैसों में कर लेगा? आधा किलो दूध भी लेगा तो आधे पैेसे तो इसी में चले जाएंगे। 15 किलो आटा के 200 रुपये तो 15 किलो चावल के करीब 375 रुपये हो जाते हैं। इस तरह आटा, चावल और दूध के ही हजार रुपये से ऊपर हो गए। कपड़े-लत्ते, हारी-बीमारी का क्या? बच्चों की स्कूल फीस और किताबों का क्या ? सब्जी कहां से आएगी? और नमक भी तो नहीं खरीद पाएंगे? दाल की बात तो दूर की कौड़ी हो जाएगी। कहीं आने जाने के लिए किराया कहां से लाएंगे? किसी दिन रेस्टोरेंट में खाने का मन हुआ तो क्या आपके घर चले जाएंगे?
जाहिर है कि जिन आंकड़ों से आप सच को छिपाना चाह रहे हैं वहीं आंकड़े आपकी हकीकत बयां कर रहे हैं। आप अपनी नजाकत पर खुश और मुग्ध हो सकते हैं। लेकिन आंकड़ों की नफासत तो देखिए वे अपने ही रचनाकार पर मुस्कुरा रहे हैं। सृजनकर्ता को हत्यारा बता रहे हैं।

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

बंद बोतल में पुरानी शराब


लोकपाल एक बार फिर चर्चा में है। ऐसे में इसके बारे में कुछ जानकारियां काफी दिलचस्प हैं। मैंने यह लेख सितंबर २००४ में लिखा थ। नवभारत टाइम्स से इसे अपने सितंबर २००४ के अंक में प्रकाशित किया था। ऐसा नहीं है कि लोकपाल आज का मुद्दा है। समय -समय पर यह मामला आता रहा है। इस लेख को पढ़कर इसे समझा जा सकता है। - ओमप्रकाश तिवारी

लोकपाल का मामला एक बार फिर उठा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से लोकपाल की नियुक्ति में देरी का कारण बताने को कहा है। पिछले दिनों अदालत ने महान्यायवादी हरीश साल्वे से पूछा कि अखबार खोलने पर रोज एक नया घोटाला सामने आता है , तो ऐसे में क्या यह ठीक नहीं होगा कि सार्वजनिक जीवन में पांव पसारते भ्रष्टाचार के मद्देनजर लोकपाल की नियुक्ति कर दी जाए। इस पर श्री साल्वे ने पिछले साल लोकसभा में पेश हो चुके लोकपाल विधेयक का जिक्र किया। अब देखना यह है कि सरकार क्या कदम उठाती है।
यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि जो काम सरकार को करना चाहिए , उसकी याद अदालत दिला रही है। इससे तो यही लगता है कि वह अपने कर्तव्यों का सही तरह से पालन नहीं कर रही है। आखिरकार लोकपाल की कल्पना इसीलिए की गई थी कि हर रोज हो रहे घोटालों पर अंकुश लगाया जा सके , लेकिन यह कल्पना आज तक मूर्त रूप महज इसलिए नहीं ले पाई क्योंकि राजनेता ऐसा नहीं चाहते। यही कारण है कि लोकपाल पर चर्चा होती है , लोकसभा में विधेयक भी पेश हो जाता है , लेकिन कोई न कोई ऐसी अड़चन डाल दी जाती है कि वह पारित नहीं हो पाता। ऐसा देखा गया है कि लोकपाल विधेयक को ऐसे अवसर पर पेश किया जाता है कि उस पर बहस के लिए समय ही नहीं मिलता और बात आई-गई हो जाती है। दरअसल हमारे राजनेताओं के लिए लोकपाल बोतल में बंद उस जिन्न की तरह है , जो बाहर निकलते ही पलट कर मार कर सकता है।
14 अगस्त 2001 को संसद के मानसून सत्र में लोकपाल विधेयक 2001 पेश करके प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस संस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का इजहार किया , लेकिन इससे पहले कि यह विधेयक पारित हो पाता सत्र खत्म हो गया। उसके बाद किसी ने याद भी नहीं किया कि ऐसा विधेयक पेश किया गया था। इससे इन आरोपों को बल मिला है कि इस विधेयक को पेश करने के पीछे सरकार की मंशा कुछ और थी। उस वक्त भ्रष्टाचार को लेकर वाजपेयी सरकार पर लगातार उंगलियां उठ रही थीं। यूटीआई मामले में उनके कार्यालय पर आरोप लगे थे और उन्होंने अपने पद से इस्तीफे की धमकी दे दी थी। इसलिए जब लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया गया तो बहुत से लोगों ने सोचा कि यह बढ़ते भ्रष्टाचार से जनता का ध्यान हटाने के लिए उठाया गया कदम है। बावजूद इसके यदि यह विधेयक संसद में पास हो जाता और लोकपाल नामक संस्था अस्तित्व में आ जाती , तो इससे जनता को कुछ उम्मीद बंधती , क्योंकि इसमें प्रधानमंत्री तक को जांच के दायरे में लाया गया था।
इस विधेयक के अनुसार लोकपाल और इसके सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति एक समिति की सिफारिश के आधार पर करेंगे। उपराष्ट्रपति , प्रधानमंत्री , लोकसभा अध्यक्ष , गृहमंत्री , सदन के नेता तथा लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता इस समिति के सदस्य होंगे। लोकपाल की जांच के दायरे में प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद के सदस्यों , सांसदों और सरकारी कर्मियों को रखा गया था। विधेयक के मुताबिक लोकपाल भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम 1988 के तहत मिली शिकायतों के आधार पर सार्वजनिक पद पर बैठे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ जांच कर सकता है। लोकपाल को यह न्यायिक अधिकार होगा कि वह किसी भी व्यक्ति को सम्मन भेजकर हाजिर होने , किसी दस्तावेज को मांगने और साक्ष्य लेने का आदेश जारी कर सकता है। लोकपाल की जांच के दायरे से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश , निर्वाचन आयुक्तों तथा अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों को बाहर रखा गया है। उल्लेखनीय है कि ऐसा पहली बार था कि लोकपाल को कुछ अधिकार दिए गए थे , नहीं तो इससे पहले जितनी बार भी यह विधेयक लोकसभा में पेश किया गया , उसे शक्तिहीन बनाए रखने का पूरा प्रावधान किया गया था।
इस बार जब लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया गया था तो कांग्रेस ने भी इसका समर्थन किया था , लेकिन यह पारित नहीं हो पाया। तब से कोई इसकी सुध नहीं ले रहा है। यदि हमारे राजनेताओं में भ्रष्टाचार से लड़ने की इच्छाशक्ति होती और वे सचमुच इस पर अंकुश लगाना चाहते , तो उनकी प्राथमिकता सूची में लोकपाल विधेयक होना चाहिए था।
1969 से लेकर अब तक आठ बार लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया गया है। मोरारजी देसाई की अध्यक्षता वाले प्रशासनिक सुधार आयोग ने नागरिकों की शिकायतें दूर करने के बारे में अपनी अंतरिम रिपोर्ट 1966 में दी थी , जिसमें अन्य बातों के अलावा स्वीडन के ओम्बड्समैन की तरह लोकपाल संस्था स्थापित करने की सिफारिश थी। आयोग की इस सिफारिश पर अमल करते हुए पहली बार चौथी लोकसभा में 1968 में विधेयक पेश किया गया। यह 1969 में पारित भी हो गया , लेकिन राज्यसभा की मंजूरी मिलने से पहले लोकसभा ही भंग हो गई। इसके बाद इसे 1971 में पांचवीं लोकसभा में फिर पेश किया गया। फिर इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया। समिति ने जुलाई 1978 में अपनी रिपोर्ट भी दे दी , लेकिन जब इस रिपोर्ट पर लोकसभा में चर्चा हो रही थी , तभी लोकसभा फिर भंग हो गई। इसके बाद इसे 1985 में आठवीं लोकसभा में लाया गया , लेकिन फिर वापस ले लिया गया। इसे 1989 में फिर लोकसभा में पेश किया गया। इस बार इसके जांच के दायरे में प्रधानमंत्री को भी लाया गया था , लेकिन नौवीं विधानसभा के भंग होने से यह प्रस्ताव निरस्त हो गया। 13 सितंबर 1996 को 11 वीं लोकसभा में एक बार फिर लोकपाल विधेयक प्रस्तुत किया गया। इसे गृह मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति को जांच करने और रिपोर्ट देने के लिए सौंपा गया। समिति ने 9 मई 1997 को अपनी रिपोर्ट दे दी , लेकिन इससे पहले कि सरकार उसकी सिफारिशों को अमली जामा पहना पाती , लोकसभा भंग हो गई। यही हाल इसका 12 वीं लोकसभा में हुआ , जब संसदीय समिति की रिपोर्ट पर विचार होने से पहले ही लोकसभा भंग हो गई। लेकिन आठवीं बार लोकसभा तो सही सलामत रही , पर नेताओं में ही इस पर एका नहीं बन पाया।
ऐसे में यह मानना सही होगा कि लोकपाल विधेयक पेश करने का मकसद भ्रष्टाचार से सचमुच लड़ना नहीं , लड़ते हुए दिखना भर है। भ्रष्टाचार सिर्फ भारत की ही नहीं , एक वैश्विक समस्या है। इसलिए दूसरे देशों में इससे लड़ने के लिए हो रही कोशिशें हमारे लिए गौर करने लायक हैं। स्वीडन में 1909 में ओम्बुड्समैन नामक संस्था की परिकल्पना की गई , जिसे 1919 में फिनलैंड ने मूर्त रूप दिया। इसके बाद 1955 में डेनमार्क ने , 1962 में न्यूजीलैंड ने और 1964 में ब्रिटेन ने इसे अपनाया। अलबत्ता इन सभी देशों में इसका उद्देश्य समान होते हुए भी रूप भिन्न है। यानी सभी ने अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से इसे लागू किया।
भारत में तो आजादी के बाद से ही लोकपाल की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी , क्योंकि हमें जो सत्ता अंग्रेजों ने हस्तांतरित की थी , उसकी बुनियाद ही भ्रष्टाचार पर टिकी थी। स्वाभाविक ही था कि आजादी के साथ हमें भ्रष्टाचार भी मिला। इससे जूझने के लिए लोकपाल की जरूरत महसूस की गई , लेकिन राजनीतिक स्वार्थों ने इसे हकीकत में बदलने नहीं दिया। अब जबकि अदालत ने सरकार से इस बारे में पूछा है , तो देखना यह है कि वह क्या कदम उठाती है। लेकिन इतना तो तय ही है कि इसके प्रति सरकार ही नहीं , विपक्ष का भी उदासीन रवैया परेशान करने वाला है।














शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

आचरण के आईने में गलत-सही का द्वंद्व


मुख्य चुनाव आयुक्त डाक्टर एसवाई कुरैशी ने पिछले दिनों कहा कि पूरी दुनिया इस बात की तारीफ करती है कि भारत जैसे विविधता वाले और ७१ करोड़ से अधिक मतदाता वाले देश में सफलतापूर्वक चुनाव सम्पन्न हो जाते हैं। लेकिन जब वह यह कहते हैं कि आपकी व्यवस्था में अपराधी संसद और विधानसभाओं में चुनकर क्यों आ जाते हैं, तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। उन्हें यह तर्कसंगत नहीं लगता कि कानून के अनुसार अंतिम अपील कोर्ट में दोषी सिद्ध होने तक किसी को दोषी नहीं माना जा सकता।

इस द्वंद्व और अंतर्विरोध को हम इस तरह से समझ सकते हैं। जिसकी जैसी मानसिकता उसका आचारण भी वैसा ही होता है। आदमी के आचारण में ही उसकी मानसिकता परिलक्षित होती है। भ्रष्ट मानसिकता वाला भ्रष्टाचार की संस्कृति को ही पुष्पित-पल्वित करता है। अपराध की मानसिकता वाला अपराध की गंगा-जमुना बहाने में ही पूरी जिंदगी लगा रहता है। इसी तरह अपराधी और भ्रष्टाचारी के आचरण से ही हम उसकी मानसिकता को समझ सकते हैं। ऐसी मानसिकता और ऐसे आचरण वाले किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक होते हैं। इसलिए ऐसे लोगों की जगह नागरिक समाज में नहीं होनी चाहिए। बेशक इस तरह के अधिकतर लोग कानून के दायरे से या तो बाहर होते हैं या फिर दांव-पेंच से खुद को बेहतर नागरिक साबित करने में लगे रहते हैं। ऐसे लोगों का कथन होता है कि जब तक उन्हें अदालत से सजा नहीं मिल जाती उन्हें दोषी नहीं माना जा सकता। कानूनन वह सही होते हैं लेकिन उनका आचरण उन्हें गलत साबित कर रहा होता है। कानून की प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल होती है कि ऐसे लोगों को कानून के शिकंजे में कसने में बहुत समय लग जाता है। कानूनी प्रक्रिया में बहुत सारे लोग शाम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना कर बइज्जत बरी भी हो जाते हैं। कुछ ही होते हैं जिन पर कानून अपना शिकंजा कस पाता है। कई बार इसमें अंतर करना मुश्किल हो जाता है कि जो बइज्जत बरी हो गया है वह वाकई दोषमुक्त है। अथवा जो दंडित हुआ है वाकई दोषी है। इसका यह मतलब नहीं है कि कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनानी चाहिए। तमाम खामियों के बावजूद इसका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन मानसिकता और आचरण से किसी का कृत्य छिपा नहीं रहता। ऐसे लोगों को कानून बेशक पाक-साफ घोषित कर दे लेकिन समाज में न तो उन्हें प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए और न ही महत्वपूर्ण दायित्व।

मुख्य चुनाव आयुक्त डा. कुरैशी पूछते हैं कि बिना दोष सिद्ध हुए जेलों में २,५७,९५८ लोग बंद हैं लेकिन उनके जैसे आरोपी नेता बनकर सारी सुविधाएं क्यों भोग रहे हैं? इस तरह आम आदमी की स्वतंत्रता का हनन क्यों किया जा रहा है? वह कहते हैं कि इस सवाल पर न्यायपालिका और संसद में बहस होनी चाहिए। बहस न्यायपालिका और संसद में ही नहीं समाज में भी होनी चाहिए। आखिरकार ऐसे लोगों को दंडि़त करने की अंतिम जिम्मेवारी समाज की ही है।

हाल ही में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल सर्वे की रिपोर्ट आई है, जिसमें सबसे ज्यादा भ्रष्ट राजनीतिक दलों को बताया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के लोग सियासी दलों के बाद पुलिस को सबसे अधिक भ्रष्ट मानते हैं। उसके बाद सांसद, फिर सरकारी अधिकारी, उसके बाद शिक्षा विभाग और फिर उद्योगपति हैं। ऐसे लोगों के मामले अदालतों में बेशक लंबित हों लेकिन उनके आचरण के आधार पर तो उन्हें संसद या विधानसभाओं में जाने से रोका ही जाना चाहिए। यदि ऐसे लोग संसद या विधानसभाओं में जाते हैं तो हम एक बेहतर समाज की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
सच तो यह है कि देश का बहुत बड़ा वर्ग केवल वोटर बनकर रह गया है। हमारे नेता उनसे वोट लेते हैं और फिर उन्हें भूल जाते हैं। संसद और विधानसभाओं में पहुंचने वाले लोग अपनी कमाई दोगुनी और चौगुनी करने में लग जाते हैं। उनके इर्दगिर्द ऐसे लोगों की चौकड़ी जमा हो जाती है जिनका मकसद अपना स्वार्थ साधना होता है। ऐसे में आम लोग हाशिए पर चले जाते हैं। यह अकारण नहीं है कि देश की आधे से अधिक आबादी गरीबी की नाली में कीड़े-मकोड़े की तरह बिलबिला रही है और मुठ्ठी भर लोग ऐश कर रहे हैं। सड़कों पर कुछ लोगों की चमचमाती कारों की वजह से आम आदमी का पैदल चलना दूभर हो गया है। बसों और ट्रेनों में आम आदमी पशुवत यात्रा कर रहा है और इवाई जहाज का किराया बढ़ जाता है तो सरकार की त्योरी चढ़ जाती है और हवाई कंपनियों को किराया कम करना पड़ता है। दूसरी ओर आम आदमी की बुनियादी वस्तुओं की कीमतें आसमान को छू रही होती हैं और सरकार के कान पर जंू तक नहीं रेंगती। सत्ता और समाज के प्रभु वर्ग में ऐसी सांठगांठ हो गई है कि आम आदमी की सिसकियां न तो किसी को सुनाई दे रही हैं और न ही उसका आंसू किसी को दिखाई दे रहा है।

भ्रष्टाचार में सियासी दल पहले तो सांसद तीसरे नंबर पर क्यों हैं? यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब राजनीतिक दलों और सांसदों को ही देना होगा। समय रहते यदि उन्होंने इसका उत्तर नहीं दिया तो वक्त उन्हें खुद ही जवाब दे देगा। जब से मानव सभ्यता ने इस धरती पर जन्म लिया है तब से कई सभ्यताएं आईं और गर्इं। वर्तमान व्यवस्था भी कोई अपवाद नहीं होगी। इसे बचना है तो इस बात को स्वीकार करना होगा कि जिन राजनेताओं पर आरोपपत्र दाखिल हो गए हैं और जिनके खिलाफ अदालत में कार्यवाही चल रही है उन्हें चुनाव से दूर ही रखा जाए। इसके अलावा आम लोगों को भी भ्रष्टचारियों और दागियों से घृणा करनी होगी चाहे वह किसी भी वर्ग का हो। जिनके आचरण को हम गलत मानते हैं उनके हाथों में सत्ता सौंपने का मतलब है अपना मर्सिया खुद पढऩा। जैसा कि आजकल हम देख रहे हैं। आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला और टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, खाद्यान्न घोटाला, जमीन घोटाला तो इसकी ताजा मिसाल हैं। इन सब मामलों में लिप्त लोगों को कानून बेशक पाक-साफ घोषित कर दे लेकिन ऐसे लोगों का आचरण समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के लायक तो कदापि भी नहीं है।