Thursday, June 25, 2009
लालगढ़ का सच
लालगढ़ में संघर्ष चल रहा है बचे रहने का और उजाड़ दिये जाने का, पर लालगढ़ के संथाली आदिवासियों का उजड़ना महज़ देश के सबसे बड़े आदिवासी समाज के एक हिस्से का उजड़ना भर नहीं है. बल्कि यह संथाली समाज का अपने उस प्राचीन भूमि से उजाड़ा जाना है जहाँ वह पहली बार आकर बसा था और यहीं से पूरे देश में फैला था. देश में आज भी सबसे बड़ी संख्या संथाली आदिवासियों की है. तथाकथित सभ्य समाज के निर्माण व सालबोनी सेज परियोजना के निर्माण की प्रक्रिया में जुटे लोग जब आज इन्हें इनकी जमीन से विस्थापित करने पर आतुर हैं तो उसके खिलाफ इन आदिवासी महिला पुरूषों का लामबंद होकर विद्रोह करना लाज़मी है.
अपने जंगल और जमीन को छीने जाने के खिलाफ आदिवासियों का यह पहला विद्रोह नहीं है. इसके पहले अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिरसा मुंडा, तेभागा, तेलंगाना आदिवासी विद्रोह की एक लंबी सूची है पर ये विद्रोह आदिवासियों द्वारा राज्य सत्ता हथियाने को लेकर कभी नहीं किये गये बल्कि इनका स्वरूप अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने को लेकर ही रहा. पूरे देश में जंगल का एक लम्बा क्षेत्र है जहाँ आदिवासी समाज बिना किसी स्वास्थ, शिक्षा, बिजली के जी या मर रहा है. बारिस के दिनों में बाढ़ व मलेरिया से कितने आदिवासी मर जाते हैं
लालगढ़ का सालबोनी प्रोजेक्ट में जंगल की ५००० एकड़ जमीन को लिया जा रहा है जबकि वन प्राधिकरण नियम के तहत भी यह गैर कानूनी है. ५०० एकड़ जमीन जिंदल स्टील कम्पनी के मालिक द्वारा वहाँ के लोगों से औने-पौने दाम पर खरीदी जा चुकी है पर लोगों को इसकी आधी ही कीमत चुकायी जा रही है और आधी कीमत कम्पनी शेयर के रूप में देने की बात कहकर टाल दी गयी है. जबकि ४५०० एकड़ जमीन जिसे सरकार लेने पर तुली है लोग छोड़ना नहीं चाहते जिसको लेकर वहाँ के आदिवासी एक जुट हो गये हैं. अपने जंगल और जमीन को लेकर हुई एक जुटता व प्रतिरोध को ही माओवाद के रूप में या किसी आतंक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, क्योंकि सरकार की दमन नीति व सेना के सशस्त्र कार्यवाहियों से लड़ने के लिये वहाँ के आदिवासी भी हथियार उठा चुके हैं.
दरअसल सरकार द्वारा जंगल के संसाधनों को पूंजीपतियों के हाँथों में सौंपे जाने पर हो रहे किसी भी प्रतिरोध के दमन का यह नायाब तरीका पिछले कई वर्षों से अपनाया जा रहा है कि वह जल, जंगल, जमीन से जुडे़ आदिवासी प्रतिरोध में माओवादियों का हाथ बताकर आदिवासियों या नागरिकों की हत्यायें व प्रताड़ना का लाइसेंस प्राप्त कर लेती है. ऎसी स्थिति में जंगल का एक बडा़ आदिवासी समाज माओवादी बनाया जा रहा है ताकि सरकार जंगल अधिग्रहण के खिलाफ होने वाले प्रतिरोध का दमन माओवाद के नाम पर आसानी से कर सके. 22 नवम्बर 2008 को बुद्धदेव भट्टाचार्य ने २४ परगना में भाषण देते हुए लालगढ़ में माओवादियों के होने की बात इसीलिये ही कही थी ताकि वे केन्द्र से ज्यादा अर्धसैनिक बल व विशेष रकम मांग सकें.
आज जब इस बात का शोर मचाया जा रहा है कि लालगढ़ में माओवादियों का कब्जा हो चुका है तो लालगढ़ में लोगों द्वारा शस्त्र उठाने की पूरी प्रक्रिया पर हमे गौर करना होगा. आदिवासी जंगल की जमीन दिये जाने के खिलाफ थे. इसके बावजूद रामविलास पासवान और बुद्धदेव भट्टाचार्य ने 2 नवम्बर 2008 को सालबोनी स्टील प्लांट का उद्घाटन किया जिसके पश्चात इनके काफिले पर हमला हुआ. इस हमले के फलस्वरूप लालगढ़ के आस-पास के तकरीबन ३५ गाँवों में पुलिस द्वारा लोगों को प्रताड़ित किया गया, उन्हें मारा पीटा गया व महिलाओं की आँख तक फोड़ दी गयी,परियोजना के खिलाफ गाँवों को एक जुट करने वाले युवाओं की हत्या तक कर दी गयी और यह सब माओवादियों का ठप्पा लगाकर किया गया. यदि अपने जमीन और जंगल को बचाने के लिये प्रतिरोध करना माओवाद है तो इतिहास का हर आदिवासी विद्रोह ऐसे ही अपने अस्तित्व की सुरक्षा के साथ हुआ है . जिन बिरसा मुंडा और दूसरे लड़ाकों को वर्तमान सरकार नायक के रूप में स्थापित करती है पर फर्क इतना जरूर है कि वह अंग्रेजी व सामंती सत्ता के खिलाफ था और यह वर्तमान लोकतांत्रिक कही जाने वाली व्यवस्था के खिलाफ है .इतने दमन के बावजूद आदिवासियों ने जो मांग रखी वे बहुत ही सामान्य थी. उनका कहना था कि पुलिस दमन को खत्म किया जाए, लोगों पर जो आरोप लगाये गये हैं वे वापस लिये जाएं, जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उन्हे रिहा किया जाय, साथ में उन स्कूलों, हास्पिटलों व पंचायतों को मुक्त किया जाए जिनमे अर्ध सैनिक बलों ने डेरा डाला हुआ है जो कि कलकत्ता हाई कोर्ट का भी आदेश था. जनदबावो के तहत सरकार ने यह बात मंजूर भी कर ली पर यह लोगों के लिये एक छलावा साबित हुआ. सरकार महज़ उनकी लामबंदी को कम करना चाहती थी. अंततः लोगों ने ७ जनवरी 2009 को सरकार के सामाजिक बहिष्कार यानि क्षेत्र में सरकार की किसी भी संस्था के प्रवेश को वर्जित करने का फैसला लिया, लोगों ने किसी भी तरह के कर व मालगुजारी देने से भी मना कर दिया है. यह सरकार के लिये एक भयावहस्थिति थी जिससे निपटने के लिये सरकार ने छ्त्तीसगढ़ में चल रहे सलवा-जुडुम के तर्ज पर जन प्रतिरोध कमेटी व आदिवासी ओ गैर आदिवासी एकता कमेटी का निर्माण किया गया जिसमें सी.पी.एम. व झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के लोगों को शामिल किया गया है. ये सैकड़ों की संख्या में जाकर गाँवों को लूटते है व लोगों को मारते पीटते हैं .इसी कारणवश लोगों का आक्रोश और भी उभर कर सामने आया है.यद्यपि सी.पी.एम. सरकार इस समस्या का राजनीतिक हल निकालने की बात कहती रही है पर राजनीतिक हल के तौर पर उसने सिर्फ दमन ही किया है ताकि वह लालगढ़ को भेद सके.
लालगढ़ में जारी असंतोष संथाली समाज के वंचना की पीड़ा है जिसमे विकास के नाम पर हर बार उनका उजाड़ा जाना, उनकी जमीनों को पूजीपतियों के हाथ में बेचा जाना, जिसके बाद नदियों का नालों में बदल जाना तय है. क्योंकि जिस स्टील प्लांट को जिंदल यहाँ स्थापित करना चाहते हैं वह एक बड़ी परियोजना है जिसके शुरूआती दौर में ही ३५,००० करोड़ रूपये लगाये जा रहे हैं व २०२० तक एक करॊड़ मैट्रीक टन के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है जिससे आस-पास के तीन जिले व सुवर्ण रेखा नदी जो वहाँ के लोगों की जीवन रेखा भी है का प्रदूषित होना तय है. अतः यहाँके लोगों के पास सिवाय विरोध के कोई रास्ता नहीं बचता क्योकि सरकार इनकी उन मांगों को भी लागू नहीं कर पा रही है जो मूलभूत अधिकारों के तहत मिलनी चाहिये जिसमे रोजगार, संथाली भाषा और संस्कृति को बढ़ावा दिया जाना, व बेहतर स्वास्थ, शिक्षा, व कृषि की सुविधा जैसी १३ मांगे शामिल हैं. पर इनकी मांगे लाठियों से पूरी की जा रही हैं. ऎसे में एक बडे़ क्षेत्र में विस्तृत संथाली आदिवासियों का एक जुट होकर प्रतिरोध करना दमित की एकता है.
(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में मीडिया के छात्र हैं.chandrika.media@gmail.com)
-- anil janvijayकृपया हमारी ये वेबसाइट देखें www.kavitakosh.orgwww.gadyakosh.org
Saturday, November 8, 2008
मधु कांकरिया को मिला कथाक्रम सम्मान-2008

मधु कांकरिया ने मारवाड़ी समाज से ताल्लुक रखते हुए भी उसके दुराग्रहों से बाहर निकलकर लेखन किया है। यह चीज उन्हें अन्य मारवाड़ी लेखिकाआें से अलग करती है। यह बात वरिष्ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने राय उमानाथ बली प्रेक्षाग्रह में पश्चिम बंगाल की लेखिका मधु कांकरिया को आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान प्रदान करने के बाद कही। इस प्रतिष्ठापूर्ण सम्मान के साथ ही कथाक्रम-२००८ के दो दिवसीय आयोजन का आगाज हुआ। मधु को प्रख्यात आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी, वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र यादव और कथाकार गिरिराज किशोर ने शॉल, स्मृति चिह्न और १५ हजार रुपये का चेक देकर पुरस्कृत किया। मधु कांकरिया खुले गगन के लाल सितारे, सलाम आखिरी, पत्ताखोर और सेज पर संस्कृति उपन्यासों के जरिये कथा साहित्य में पहचानी जाती हैं। इसके पहले कथाक्रम सम्मान संजीव, चंद्र किशोर जायसवाल, मैत्रेयी पुष्पा, कमलकांत त्रिपाठी, दूधनाथ सिंह, ओमप्रकाश वाल्मीकि, शिवमूर्ति, असगर वजाहत, भगवानदास मोरवाल और उदय प्रकाश को दिया जा चुका है।
राजेंद्र यादव ने कहा, 'मारवाड़ी लेखिकाआें में महत्वपूर्ण नाम मन्नू भंडारी, प्रभा खेतान, अलका सरावगी और मधु कांकरिया का है। इन सबके लेखन की पृष्ठभूमि अलग है, लेकिन मधु कांकरिया ने राजस्थानी मारवाड़ी समाज की रूढ़ियों, अंधविश्वासी नजरिए और गद्दी पर बैठ कर पैसा कमाने की वृत्ति से अलग निकलकर रचनाकर्म किया है।`
आलोचक वीरेंद्र यादव ने मधु के व्यि तत्व और कृतित्व को समग्रता में समेटने का प्रयास किया। उन्होंने कहा, 'अपने जीवन के चार दशक सामान्य गृहिणी के रूप में बिताने के बाद अभी ड़ेढ दशक पहले ही मधु कांकरिया ने लेखन शुरू किया, लेकिन वह अपनी रचनाआें से 'लेट कमर` होते हुए भी महत्वपूर्ण लेखिका बन गइंर्। वह पश्चिम बंगाल के क्षेत्र से आती हैं, जो राजनीतिक सक्रियता, वैचारिक हस्तक्षेप और अन्य मसलों का क्षेत्र है। उसे ही उन्होंने लेखन में बुना। उन्होंने इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या न सलवाद को लेखन के लिए चुना। उन्होंने सामंती पितृसत्तात्मक समाज और धर्म से नारी की मुि त को वैचारिक आधार दिया। उनका लेखन सिद्धांत से निस्सृत न होकर जीवन की व्यावहारिकता से उद्भूत है।`
प्रख्यात कथाकार गिरिराज किशोर ने उनके उपन्यास 'सेज पर संस्कृति` का जिक्र करते हुए कहा, 'जब स्त्री सश तीकरण की बात उठती है, तो शरीर की मुि त में ही नारी की मुि त की चर्चा होती है। लेकिन स्त्री सश तीकरण का एक माध्यम वह भी है, जिसे मधु कांकरिया ने उठाया है। उन्होंने धर्म से स्त्री की मुि त की बात उठाई है। उन्होंने सभी धर्मों के दकियानूसीपन को उजागर किया है। लेखक का अनिवार्य पक्ष है कि वह चीजों का विश्लेषण करके लिखे। मधु के लेखन में यह मिलता है।`
कथाक्रम सम्मानित लेखिका मधु कांकरिया ने अपने दो टूक उद्बोधन में अपने बचपन, पारिवारिक स्थिति और बंगाल के परिवेश को याद करते हुए अपनी रचना यात्रा की शुरुआत की वजह बताई। उन्होंने कहा, 'अपने भाई और उसके मित्रों से मैंने यूबा की क्रांति, वियतनाम के संघर्ष और रूस की क्रांति की बातें सुनी थीं। लेकिन पश्चिम बंगाल में न सलवाद तेजी से फैल गया। हिंसा का तांडव शुरू हो गया। भाई के इंजीनियरिंग कॉलेज से लौट आने से हमारी खुशियों और उम्मीदों पर तुषारापात हो गया। इसी बीच २० हजार मासूम नवयुवक न सलवाद की भेंट चढ़ गए। बरसों बाद जब कलम उठी तो प्रेम कहानी लिखना चाहती थी, लेकिन मेरा पहला उपन्यास खुले गगन के लाल सितारे की कहानी इन्हीं नवयुवकों को समर्पित हो गई, जो बेकसूर मारे गए थे।` उन्होंने कहा कि लेखक उन्हीं सवालों को उठाता है, जो जिंदगी उसके झोले में डाल देती है।
कार्यक्रम में प्रख्यात आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी, शैलेंद्र सागर, वीरेंद्र यादव व स्थानीय व देश भर से आए कथाकारों की भी सहभागिता रही।
साभार अमर उजाला
Wednesday, November 5, 2008
रवींद्र कालिया और ममता कालिया को जनवाणी सम्मान
Friday, October 17, 2008
आगे बढ़ती भूख की कहानी
![]() | निष्ठा चुघ लंदन से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए | |
![]() | |
| दुनियाभर में बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषण के शिकार हैं |
लुपलुपाती आँखों वाला एक निर्मम माँसखोर पक्षी और उससे थोड़ी ही दूर ज़मीन पर हड्डियों के ढांचे पर खींचखांच कर थोड़ी सी चमड़ी पहने इंसान का एक बच्चा. दोनों ही भूखे थे.
गिद्ध की पैनी नज़रें इस इंतज़ार में कि कब वो भूख और गरीबी से बेहाल ज़िंदा माँस का लोथड़ा, जो एक किलोमीटर दूर एक राहत शिविर तक कीड़े की तरह रेंग कर पहुंचने की नाकाम कोशिश कर रहा था, दम तोड़े और वो उसे नोच खाए.
भूख की कहानी कहती वो ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर 1993 में सूडान में पड़े भंयकर अकाल के दौरान ली गई थी। और इस तस्वीर को लेने वाले फोटोग्राफर कैविन कॉर्टर को इस मानवीय त्रासदी को दुनिया के नाश्ते की टेबल तक पहुंचाने के लिए पुलिट्ज़र अवॉर्ड से नवाज़ा गया था. तब मैं स्कूल में पढ़ती थी. लेकिन तस्वीर को देख कर ऐसा लगा था जैसे किसी ने लाखों सुइयों की नोक पीसकर मेरी नसों में उंडेल दी हो.
साभार बी बी सी हिन्दी डॉट कॉम
Wednesday, October 8, 2008
पूँजीवाद के भविष्य पर सवालिया निशान
![]() | मुकेश शर्मा बीबीसी संवाददाता | |
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| इस आर्थिक संकट में सरकारी हस्तक्षेप ने पूँजीवाद के भविष्य पर सवालिया निशान लगाए हैं |
अमरीकी सरकार और यूरोप में सरकारें जिस तरह बैंकों को बचाने के लिए बड़े-बड़े आर्थिक पैकेज दे रही हैं उसके बाद सवाल उठ रहा है कि क्या पूँजीवाद का स्वरूप बदल गया है या पूँजीवाद समाप्त हो रहा है.
बड़े-बड़े, दिग्गज अर्थशास्त्रियों को भी अंदाज़ा नहीं था कि संकट की कितनी पर्तें एक के बाद एक खुलेंगी और बात यहाँ तक पहुँचेगी कि पूँजीवाद की वकालत करने वाला अमरीका अपने यहाँ के आर्थिक संस्थानों को बचाने के लिए सरकारी हस्तक्षेप का सहारा लेगा.
और सहारा भी ऐसा वैसा नहीं 700 अरब डॉलर का, यानी अमरीका में डूबती कंपनियों को सहारा देने के लिए हर अमरीकी- बूढ़े से लेकर बच्चे तक, की ओर से लगभग सवा दो हज़ार डॉलर की मदद.
इस पैकेज को लेकर ख़ुद अमरीकी राजनीतिज्ञ कितना असहज थे उसका अंदाज़ा इसी बात से लगता है कि प्रस्ताव जब अमरीकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा में दूसरी बार पहुँचा तो अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की पुरज़ोर कोशिश के बावजूद, उनकी रिपब्लिकन पार्टी के 91 सदस्यों ने इस पैकेज का समर्थन किया और 108 ने विरोध.
अगर डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्यों ने साथ न दिया होता तो ये प्रस्ताव कभी पारित नहीं हो पाता.
मगर ये पूरा नाटकीय घटनाक्रम अमरीकी पूँजीवाद पर सवाल ज़रूर उठा गया.
बढ़ता हस्तक्षेप
मोटे तौर पर पूँजीवाद एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ बाज़ार किसी भी केंद्रीय आर्थिक नियंत्रण या हस्तक्षेप से मुक्त है और लाभ के लिए उत्पादन और वितरण मुक्त बाज़ार ही तय करता है.
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विश्व बैंक के पूर्व उपाध्यक्ष शाहिद जावेद बर्की अमरीका में डगमगाते पूँजीवाद के बारे में कहते हैं, "पूँजीवाद काफ़ी ज़बरदस्त तरीक़े से बदला है. इसकी वजह से अब निवेश बैंकिंग समाप्त हो गई है और जो निवेश बैंक बचे हैं वे व्यावसायिक हो गए हैं."
बर्की के अनुसार, "अब पूरी व्यवस्था पर निगरानी रखने वाली एक नई प्रणाली बनेगी जिससे वित्तीय संस्थानों पर अमरीकी सरकार का नियंत्रण बढ़ेगा."
मगर भारतीय प्रबंधन संस्थान के पूर्व प्रोफ़ेसर डॉक्टर भरत झुनझुनवाला मानते हैं कि हस्तक्षेप पूँजीवाद के एक हिस्से को ही प्रभावित करेगा.
उनका कहना है, "अमरीका अब तक मानता था कि खुली अर्थव्यवस्था में हम जीतेंगे. मगर अब उसे समझ में आएगा कि इस खुली अर्थव्यवस्था में दूसरे देश भी जीत सकते हैं. इसलिए अमरीका खुली अर्थव्यवस्था से पीछे हटकर संरक्षणवाद को अपनाएगा मगर पूँजीवाद समाप्त नहीं होगा."
सामाजिक पूँजीवाद
इस बारे में ब्रिटेन में बेडफ़र्ड के क्रैनफ़ील्ड स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में प्रोफ़ेसर सुनील पोशाकवाले कहते हैं कि अमरीकी पूँजीवाद में अब समाजवाद की झलक भी मिलने लगी है यानी स्वरूप कुछ सामाजिक पूँजीवाद का हो गया है.
पोशाकवाले के अनुसार, "ये अमरीका के लिए गहरी चोट है. अमरीका अब तक ये कहता रहा है कि बाज़ार में सरकार का दख़ल कम होना चाहिए और जब भी चीन या भारत में सरकार ने संस्थानों को बचाने की कोशिश की अमरीका ने उसका विरोध किया. मगर अब अमरीका के पास ऐसा करने का मुँह नहीं बचेगा."
अमरीका में 700 अरब डॉलर के आर्थिक पैकेज के विरोधियों का कहना था कि जिन लोगों ने आर्थिक मामलों में इतना दुस्साहस किया, इतने बड़े ऋण लिए उन्हें सबक मिलना चाहिए, उन्हें आख़िर क्यों बचाया जाए.
मगर शाहिद जावेद बर्की के मुताबिक़ ये समय उनसे बदला लेने का नहीं है. बर्की का कहना है, "उससे आम लोगों को काफ़ी नुक़सान होता. जिन्होंने पैसा कमाया वो तो अमरीका में फ़्लोरिडा में बड़े-बड़े घरों में आराम कर रहे हैं मगर ये समय उनसे बदला लेने का नहीं है."
वह कहते हैं, "अभी तो सिस्टम को चलाना है और अगर बैंकिंग क्षेत्र में संकट बढ़ता गया या शेयर बाज़ार गिरता गया तो हम जैसे लोग काफ़ी मुश्किल में पड़ जाएँगे. इसलिए पैकेज का ये फ़ैसला सही था."
अमरीकी साख पर सवाल
पर सवाल ये भी है कि अगर बैंकिंग क्षेत्र को संकट से बचा लिया जाए तो क्या उससे आर्थिक संकट की जड़ दूर हो जाएगी? हालात सँभल जाएँगे?
इस बारे में सुनील पोशाकवाले कहते हैं, "सवाल ये भी है कि 700 अरब डॉलर की राशि आख़िर किस आधार पर तय की गई है कल को अगर पता चला कि ख़राब असेट्स की क़ीमत 1400 अरब डॉलर से ऊपर है तो बाज़ार का विश्वास और टूटेगा. जो भी क़दम उठाए जा रहे हैं वो ख़तरे से ख़ाली नहीं हैं."
इस संकट ने दुनिया में अमरीका की साख पर भी सवालिया निशान लगाया है.
न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय में ‘सेंटर फ़ॉर कैपिटलिज़्म ऐंड सोसाइटी’ में प्रोफ़ेसर और दो साल पहले अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार जीतने वाले एडमंड फ़ेल्प्स का इस बारे में कहना है, "निश्चय ही अमरीका की छवि को नुक़सान पहुँचा है. अमरीकी अर्थव्यवस्था एक बहुत ही बुरे ढंग से चलाई जा रही अर्थव्यवस्था के तौर पर दिखती है. "
फ़ेल्प्स कहते हैं कि आलोचकों को पूँजीवाद की क़मियाँ दिख गई है, "पूँजीवाद की आलोचना तो हमेशा ही होती रही है मगर अब उसके विरोधियों को मौक़ा मिल गया है और वे इस व्यवस्था की ख़ामियाँ देख पा रहे हैं."
पूँजीवाद और भारत
वैसे भारत में भी अमरीका का अनुसरण करने वालों का एक बड़ा तबका है और माना जाता है कि कुछ वैसा ही पूँजीवाद भारत में भी पैर पसार रहा है.
मगर डॉक्टर भरत झुनझुनवाला कहते हैं कि भारत की स्थिति अमरीका जैसी नहीं होगी, "भारत में शेयर बाज़ार और रिज़र्व बैंक की भूमिका तो अमरीका जैसी है मगर उस प्रणाली को चलाने के ढंग में अमरीका और भारत में काफ़ी अंतर है."
डॉक्टर झुनझुनवाला के अनुसार, "हम नेहरू के समाजवाद से निकले हैं जहाँ सरकार की भूमिका काफ़ी अहम मानी जाती है. इसलिए सरकार के लिए यहाँ दख़ल देना कोई सैद्धांतिक परेशानी का सवाल नहीं है. मगर अमरीका में ये एक सिद्धांत की बात हो जाती है. इसलिए दोनों देशों की मूल प्रणाली भले ही एक जैसी दिखे मगर दोनों को चलाने के ढंग में अंतर है."
अमरीका में भावी राष्ट्रपति के सामने मौजूदा आर्थिक संकट एक बड़ी चुनौती होगी और शायद यही समझते हुए चुनाव में दोनों उम्मीदवारों जॉन मैकेन और बराक ओबामा ने अर्थ जगत में ज़्यादा नियंत्रण की वकालत की है।
Monday, October 6, 2008
गिरते शेयर बाजार में डूबते लोग

बिना आधार के सपनों का ऐसा ही ध्वंस होता है
शेयर बाजार से मुनाफा कमाने वाले आजकल मुश्किल में हैं। अमेरिका के कुछ बैंकों के दिवालिया होने तथा बिक जाने के कारण पूरी दुनिया के शेयर बाजारों में हाहाकार की स्थिति है। वैसे तो वैश्विक मंदी का रोना रोया जा रहा है, लेकिन अधिक असर शेयर बाजारों पर ही दिखाई दे रहा है। शेयर बाजार के दम पर अपनी वित्तीय पूंजी बढ़ाने वाली कंपनियों को कराे़डों-अरबों का नुकसान उठाना पड़ा है। वहीं इस आंधी से आम निवेशक भी परेशान है। उसे भी काफी घाटा हुआ है।
सोमवार यानी छह अ तूबर २००८ को मंुबई शेयर बाजार ७२४ अंकों की गिरावट के साथ ११८०१ अंकों पर बंद हुआ। बताते हैं कि जनवरी २००८ के उच्चतम स्तर से अब तक ४३ फीसदी की गिरावाट सेंसे स में दर्ज हो चुकी है।
विश्लेषकों को अश्चर्य हो रहा है कि अमेरिकी सरकार द्वारा ७०० अरब डालर का राहत पैकेज घोषित किए जाने के बावजूद शेयर बाजारों में रौनक यों नहीं लौट रही है। इसी तरह अधिकतर निवेशक भी हैरान हैं।
दरअसल, जिस तरह से कई अमेरिकी बैंकों की हालत एकदम से खराब हुई उससे निवेशक सकते में हैं। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा है कि ऐसा भी हो सकता है। एक देश जो पूरी दुनिया को सलाह देता फिर रहा हो, जिसकी नीतियों का अमल दूसरे देश जाने-अनजाने कर रहे हों, उस देश की नीतियां इस तरह से फेल हो जाएंगी इस पर कोई यकीन नहीं कर पा रहा है। हालांकि जिस नीति का अगुवा अमेरिका बनता है देर-सवेर उसकी यही परिणति होनी थी। इसी साल केशुरूआत में जब मंुबई स्टाक ए चेंज में जबरदस्त उछाल आ रही थी तो उसका कोई आधार नजर नहीं आ रहा था। हमारी अर्थव्यवस्था में कहीं से भी ऐसे संकेत नहीं थे कि शेयर बाजार इस तरह से कुलाचे भरे। लेकिन तब इस मामले पर कोई सोचने को तैयार ही नहीं था। निवेश के लिए सलाह देने वाले लोगों को भ्रमित कर रहे थे। कुछ विश्लेषक भी निवेशकों को गुमराह करने में लगे थे। हालांकि उस समय भी कई आर्थिक विश्लेषक यह कह रहे थे कि बाजार में आई तेजी एक बुलबला है। निवेशकों को सावधान रहने की जरूरत है। लेकिन शेयर बाजार के अधिकतर निवेशकों में धैर्य और सतर्क रहने की आदत नहीं होती। यह निवेशक कम पूंजी से, कम समय में अधिक मुनाफा कमाने का ख्वाब लेकर शेयर बाजार में आता है। यही कारण है कि कुछ निवेशक यदि कमाते हैं तो अधिकतर डूब जाते हैं।
भारतीय शेयर बाजार में आई तेजी का बहुतों ने लाभ उठाया, लेकिन बहुतों ने गंवाया भी है। परंतु यह शेयर बाजार का नियम है। खासकरके तब जबकि हमारा बाजार अमेरिकी बाजार से जु़डा हो। आज यदि अमेरिकी शेयर बाजार में गिरावट आती है तो भारत का शेयर बाजार ढह जाता है। शेयर बाजार में किस बात पर उतार-चढ़ाव हो जाएगा कहा नहीं जा सकता। कई तरह के कारक एक साथ काम कर रहे होते हैं। निवेशक एक-दो कारकों को समझ सकता है। लेकिन सभी कारकों का सटीक विश्लेषण संभव नहीं है। ऐसे में बाजार के उतार-चढ़ाव का नफा-नुकसान निवेशकों को होना लाजिमी ही है।
सातवीं या आठवींं कक्षा में एक कहानी पढ़ी थी। कहानी का लेखक कौन है आज याद नहीं है, लेकिन इतना पता है कि कहानी का नायक शेयर बाजार में धन लगाने के कारण कंगाल हो गया था। एक समय का अमीर आदमी अचानक सड़क पर आ गया था। तभी से शेयर बाजार को लेकर एक सतर्कता मन में आ गई थी। यह धारणा भी बन गई थी कि यह अच्छी जगह नहीं है, लेकिन आज उदारीकरण के दौर में अधिकतर मध्यमवर्गीय लोगों के लिए शेयर बाजार जिंदगी का एक पहलू सा बन गया है। यही कारण है कि शेयर बाजार की छींक से इसके निवेशकों को बुखार हो जाता है।
देखा जाए तो शेयर बाजार और लाटरी में कोई खास फर्क नहीं है। दोनों मेंं कुछ लोग लुटते हैं तो कुछ लखपति-कराे़डपति और अरबपति बन जाते हैं। इन दोनों व्यवस्थाआें को कुछ लोग अच्छा नहीं मानते, लेकिन कुछ लोग दोनों में हाथ आजमाते हैं। जिसका वह खामियाजा भी भुगतते हैं। लेकिन सवाल वहीं है कि जब आप इसके चरित्र से वाकिफ हैं तो हाय-हाय यों?
शेयर बाजार को अर्थव्यस्था का मानक नहीं माना जा सकता। जो लोग मानते हैं वह खुद और दूसरों को भी भ्रम में डालते हैं। अर्थव्यवस्था में खराब प्रदर्शन के बावजूद शेयर बाजार में उछाल दर्ज किया जा सकता है। इसी तरह अर्थव्यवस्था में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद शेयर बाजार धराशायी हो सकता है। इसकी गिरावट से अर्थव्यवस्था पर खास फर्क नहीं पड़ता। इसी तरह जब शेयर बाजार उछल रहा होता है तब भी आम आदमी की सेहत पर इसका खास फर्क नहीं पड़ता। उतार और चढ़ाव में प्रभावित निवेशक ही होते हैं। वैसे भी यहां पर अधिकतर काले धन को ठिकाने लगाया जाता है। ऐसे निवेशकों पर आप भरोसा कैसे कर सकते हैं? यही नहीं ऐसे निवेशकों के बाजार पर आप कितना भरोसा कर सकते हैं? कहा जा सकता है कि बिना आधार के सपनों का ऐसा ही ध्वंस होता है।
Monday, September 29, 2008
दुनिया के सात महापाप (deadly sins) क्या हैं?
आप में से अकसर लोगों ने दुनिया के सात आश्चर्य के बारे में सुना पढ़ा और देखा होगा इन अजूबों में अब भारत का ताजमहल भी शामिल है, लेकिन क्या आप सात महापाप के बारे में भी जानते हैं?
नए साल से गले मिलने और साथ ही पुराने साल को अलविदा कहने का समय आ गया है. पूरे विश्व में इस वक़्त मस्ती और एक प्रकार के जश्न का माहौल है और लोग न जाने कितने प्रकार के संकल्प और प्रतिज्ञा के बारे में सोच रहे होंगे... इस मौक़े पर हम लेकर आए हैं दुनिया के सात महापाप. क्या होते हैं ये सात महापाप? अंग्रेज़ी भाषा और पश्चिमी साहित्य एवं संस्कृति में इसे किस प्रकार देखा जाता है? अंग्रेज़ी में इन्हें सेवेन डेडली सिंस (Seven deadly sins) या कैपिटल वाइसेज़ (Capital vices) या कारडिनल सिंस (Cardinal sins) भी कहा जाता है. जब से मनुष्य ने होश संभाला है तभी से उनमें पाप-पुण्य, भलाई-बुराई, नैतिक-अनैतिक जैसे आध्यात्मिक विचार मौजूद हैं. सारे धर्म और हर क्षेत्र में इसका प्रचलन किसी न किसी रूप में ज़रूर है. यह सेवेन डेडली सिंस (Seven deadly sins) या कैपिटल वाइसेज़ (Capital vices) या कारडिनल सिंस (Cardinal sins) इस प्रकार हैं:
लस्ट (Lust)
ग्लूटनी (Gluttony)
ग्रीड (Greed)
स्लौथ (Sloth)
रैथ (Wrath)
एनवी (Envy)
प्राइड (Pride) यह सारे शब्द भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun) के रूप हैं लेकिन इनमें से कई का प्रयोग क्रिया और विशेषण के रूप में भी होता है. अगर इन्हें ग़ौर से देखें तो पता चलता है कि इन सारे महापाप की हर जगह भरमार है और हम में से हर एक इसमें से किसी न किसी पाप से ग्रसित है. पुराने ज़माने में इन सब को बड़े पाप में शामिल किया जाता था और उनसे बचने की शिक्षा दी जाती थी. पुराने ज़माने में ईसाई धर्म में इन सबको घोर पाप की सूची में रखा गया था क्यों की इनकी वजह से मनुष्य सदा के लिए दोषित ठहरा दिया जाता था और फिर बिना कंफ़ेशन के मुक्ति का कोई चारा नहीं था. लस्ट (Lust) यानी उत्कंठा, लालसा, कामुकता, कामवासना (Intense or unrestrained sexual craving) यह मनुष्य को दंडनिय अपराध की ओर ले जाते हैं और इनसे समाज में कई प्रकार की बुराईयां फैलती हैं. विशेषण में इसे लस्टफुल (lustful) कहते हैं ग्लूटनी (Gluttony) यानी पेटूपन. इसे भी सात महापापों में रखा गया है. जी हां दुनिया भर में तेज़ी से फैलने वाले मोटापे को देखें तो यह सही लगता है की पेटूपन बुरी चीज़ हैं और हर ज़माने में पेटूपन की निंदा हुई है और इसका मज़ाक़ उड़ाया गया है. ठूंस कर खाने को महा पाप में इस लिए रखा गया है कि एक तो इसमें अधिक खाने की लालसा है और दूसरे यह ज़रूरतमंदों के खाने में हस्तक्षेप का कारण है. मध्यकाल में लोगों ने इसे विस्तार से देखा और इसके लक्षण में छह बातें बताईं जिनसे पेटूपन साबित होता है. वह इस प्रकार हैं. eating too soon
eating too expensively
eating too much
eating too eagerly
eating too daintily
eating too fervently
ग्रीड (Greed) यानी लालच, लोभ. यह भी लस्ट और ग्लूटनी की तरह है और इसमें में अत्यधिक प्रलोभन होता है. चर्च ने इसे सात महापाप की सूची में अलग से इस लिए रखा है कि इस से धन-दौलत की लालच शामिल है (An excessive desire to acquire or possess more than what one needs or deserves, especially with respect to material wealth) स्लौथ (Sloth) यानी आलस्य, सुस्ती और काहिली (Aversion to work or exertion; laziness; indolence). पहले स्लौथ का अर्थ होता था उदास रहना, ख़ुशी न मनाना और इसे महापाप में इसलिए रखा गया था कि इस से ख़ुदा की दी हुई चीज़ से परहेज़ करना. इस अर्थ का पर्याय आज melancholy, apathy, depression, और joylessness होगा. बाद में इसे इसलिए पाप में शामिल रखा गया क्योंकि इस की वजह से आदमी अपनी योग्यता और क्षमता का प्रयोग नहीं करता है. रैथ (Wrath) ग़ुस्सा, क्रोध, आक्रोश. इसे नफ़रत और ग़ुस्से का मिला जुला रूप कहा जा सकता है जिस में आकर कोई कुछ भी कर जाता है. यह सात महापाप में अकेला पाप है जिसमें हो सकता है कि आपका अपना स्वार्थ शामिल न हो (Forceful, often vindictive anger) एनवी (Envy) यानी ईर्ष्या, डाह, जलन, हसद. यह ग्रीड यानी लालच से इस अर्थ में अलग है कि ग्रीड में धन-दौलत ही शामिल है जबकि यह उसका व्यापक रूप है. यह महापाप इस लिए है कि कोई गुण किसी में देख कर उसे अपने में चाहना और दूसरे की अच्छी चीज़ को देख न पाना. प्राइड (Pride) यानी घमंड, अहंकार, अभिमान को सातों माहापाप में सबसे बुरा पाप समझा जाता है और किसी भी धर्म में इसकी कठोर निंदा और भर्त्सना की गई है. इसे सारे पाप की जड़ समझा जाता क्योंकि सारे पाप इसी के पेट से निकलते हैं. इसमें ख़ुद को सबसे महान समझना और ख़ुद से अत्यधिक प्रेम शामिल है. अंग्रेज़ी के सुप्रसिद्ध नाटककार क्रिस्टोफ़र मारलो ने अपने नाटक डॉ. फ़ॉस्टस में इन सारे पापों का व्यक्तियों के रूप में चित्रण किया है. उनके नाटक में यह सारे महापाप इस क्रम pride, greed, envy, wrath, gluttony, sloth, lust में आते हैं. अब जबकि आपने सात अजूबों के साथ सात महापाप भी देख लिया तो ज़रा सात महापुण्य भी देख लें.
Chastity पाकीज़गी, विशुद्धता
Temperance आत्म संयम, परहेज़
Charity यानी दान, उदारता,
Diligence यानी परिश्रमी,
Forgiveness यानी क्षमा, माफ़ी
Kindness यानी रहम, दया,
Humility विनम्रता, दीनता, विनय
तो फिर क्या सोच रहे हैं। चलिए इस बार के रिज़ोल्युशन यानी संकल्प में इन महापापों से बचना और सदगुणों को अपनाना भी शामिल कर सकते हैं. वैसे जश्न के माहौल में कुछ ज़्यादा खाने से मना करने पर कहीं आप नाराज़ न हो जाएं. नव वर्ष की शुभ कामनाओं के साथ विदा लेते हैं....
बी बी सी हिन्दी से साभार


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