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संदेश

यूं ही जहरीली नहीं होती जा रही हवा

जो खबरें हैं वे गायब हैं
खबरें गढ़ी जा रही हैं
बनाई जा रही हैं
किसी के अनुकूल
किसी के प्रतिकूल
अपनी पसंद की
उसकी पसंद की
खबर जो होनी चाहिए थी
कुछ दंगाइयों ने कर लिया अपहरण
खबर वह बन गई
जो दंगाई चाहते थे
खबर वह बन गई
जो आतंकी चाहते थे
हर रोज अखबार के पन्नों में
खबर के नाम पर
परोस दिया जाता है
तमाम तरह की गढ़ी गई खबरें
ठोक पीटकर बनाई गई खबरें
आदेश-निर्देश से लिखी-लिखाई गई खबरें
कौन चाहता है इन्हें पढऩा
समाचार न विचार
केवल एक किस्म का अचार
टीवी चैनलों पर बहस का शोर
कूपमंडूक लोग फैला रहे होते हैं ध्वनि प्रदूषण
बहुत कष्ट और शोक के साथ
बंद कर देना पड़ता है टीवी
कई-कई दिन नहीं देखते हैं
टीवी पर समाचार
नहीं देखना और सुनना है
झूठ का व्याभिचार
सूचना विस्तार के युग में
गायब कर दी गई है सूचना
हर पल प्रसारित की जा रही है
गैरजरूरी गैर वाजिब सूचना
सूचना के नाम पर
अफवाहों का पैकेज
प्रसारित किया जा रहा है
अंधाधुंध चौबीस घंटे
रिफाइंड करना मुश्किल हो गया है
काम की खबरों को
शक होने लगा है
अखबार में छपी
मुस्कराती तस्वीर पर
सवाल उठता है कि क्यों हंस रहा है
क्या मिल गया है…
हाल की पोस्ट

संत मत परंपरा को तहस-नहस कर दिया गुरमीत राम रहीम ने

सचाई, ईमानदारी और समानता की नींव पर खड़े डेरे को झूठ और आडंबर का शाही महल बना दिया

संत मत का अनुसरण करने वाला डेरा सच्चा सौदा आजकल सुर्खियों में है। वजह है डेरे की गद्दी पर आसीन गुरमीत राम रहीम, जिसे दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में 20 साल की सजा मिली है। राम रहीम रोहतक की सुनारिया जेल में बंद है। किसी संत परंपरा वाले गुरु के लिए इससे शर्मनाक हरकत और कोई नहीं हो सकती। लेकिन गुरमीत तो संत है ही नहीं। संत और सूफी परंपरा से तो उसका कोई लेना देना ही नहीं है। उसने तो सूफी और संत परंपरा को पथभ्रष्ट ही नहीं, बल्कि तहस-नहस कर दिया। सादगी, सच्चाई, भाईचारा और समानता की पक्षधर संत परंपरा को गुरमीत ने लूट, ठगी, बेईमानी और अपराध का गढ़ बना दिया। आज न जाने कितने सच डेरा सच्चा सौदा में दफन हैं। इसमें कोई शक नहीं कि यह डेरे के करोड़ों अनुयायियों के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ है।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम पर कई तरह के आरोप लगे और लग रहे हैं। कुल मिलाकर संत से बाबा बने गुरमीत राम रहीम ने देश की एक ऐसी परंपरा का नाश कर दिया, जिसमें देश के बहुसंख्यक आबादी की धड़कनें बसतीं थीं। जिसकी अप…

कर्मचारियों को नींबू की तरह निचोडऩे जा रही मोदी सरकार

साल २०१४ के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी जन सभाओं में अकसर यह कहते थे कि मैं आपके सपनों को पूरा करूंगा। उन्हें सत्ता में आए तीन साल से अधिक हो गए हैं लेकिन उन्होंने देश के किस आदमी के कौन से सपने को पूरा किया है यह तो वही जानता होगा जिसके पूरे हुए होंगे। यह एक हकीकत है कि यह सराकर लगातार जनविरोधी नीतियों को लागू करती जा रही है। नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक ऐसे फैसले लिए हैं जिससे न केवल लाखों लोगों की नौकरी चली गई बल्कि कारोबार तक बंद हो गए हैं। नई नौकरियों का सृजन नहीं होने से रोजगार के अवसर भी कम हो गए हैं।
इसी बीच मोदी सरकार ने एक ऐसा कानून लाया है जो कर्मचारी और मजदूर विरोधी है। इस कानून के बाद कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को ही खत्म कर दिया गया है। यह ऐसा कानून है जिसके बाद कर्मचारियों और मजदूरों को एक तरह से बंधुआ बना दिया जाएगा। जिसके पास पैसा होगा वह लोगों ने से मनमाने तरीके से काम करा सकेगा। कारखानों से लेकर दफ्तरों तक और बंदरगाहों से लेकर रेल तक में भी काम के घंटे से लेकर दिहाड़ी मजदूरी तक काम कराने वाले तय करेगा। वह जब चाहे किसी को काम पर रखे और जब…
पनामा पेपर्स : भारत के शरीफों से कब उतरेगा नकाब?

आजकल भ्रष्टाचार चर्चा में है। बिहार में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक गठबंधन टूटकर दूसरा बन गया। इसी के साथ भ्रष्टाचार पर सियासत में नैतिकता की नई परिभाषा भी लिखी गई। दूसरी ओर पड़ोसी देश पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की कुर्सी चली गई। शरीफ की कुर्सी पनामा पेपर्स की वजह से गई है। इसके बाद से भारत भी सवाल उठ रहा है कि यहां के शरीफों का नकाब कब उतरेगा? पूछा जा रहा है कि क्या भारत में भी पनामा पेपर्स में नाम आने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी?
भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही मुहिम में शामिल होने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस्तीफा देने के दस मिनट के अंदर ही बधाई देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मसले पर मनमोहन सिंह की तरह मौन हैं। न तो उनकी मन की बात सुनाई दे रही है न ही ट्विटर पर अंगुलिया चल रही हैं। आखिर ऐसा क्यों हैं कि करीब पांच सौ भारतीयों का नाम पनामा पेपर्स में आने के बाद भी हमारे देश में उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है? जबकि पाकिस्तान में प्रधानमंत्री की कुर्सी चली गई?

इंटरनेशनल कन्सॉर्टियम ऑ…
बिहार के सियासी शोकगीत की हकीकत

बिहार में नीतीश कुमार के महागठबंधन का साथ छोड़कर भाजपा के साथ सरकार बनाने को बहुत सारे लोग सही बता रहे हैं। ऐसे लोग किसी हद तक सही हो भी सकते थे यदि वह यह नहीं कहते कि नीतीश कुमार ने अपनी बेदाग छवि बचाने के लिए ऐसा किया है। चूंकि लालू प्रसाद यादव के बेेटे और सरकार में उप मुख्यमंत्री रहे तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा है तो वह सरकार नहीं चला पा रहे थे। इस्तीफा देने के बाद नीतीश ने कहा भी कि कफन में थैली नहीं होती और लालच की कोई सीमा नहीं होती और लोकतंत्र लोकलाज से चलता है। यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार बचाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने लालू का समर्थन किया, जिसका मतलब है कि भ्रष्टाचार का समर्थन करना। नीतीश ने इस्तीफा दिया तो पीएम नरेंद्र मोदी ने ट्विट करके बधाई दी। कहा कि भ्रष्टाचार की लड़ाई में उनका स्वागत है।

दरअसल, यह सारे तर्क अपनी सुविधानुसार गढ़े गए हैं। यह सब वैसे ही है जैसे अपराध करने वाला अपने पक्ष में तर्क देता है। हकीकत यह है कि नीतीश कुमार महागठबंधन में सहज नहीं थे। उनकी मनमानी नहीं चल रही थी। बाजवजूद इस…
परिवर्तन लाजमी है तो डरना क्यों?
- ओमप्रकाश तिवारी
मानव सभ्यता अंतरविरोधों के परमाणु बम जैसी है। इसके अंतरविरोध परिवर्तनशील बनाकर इसे आगे बढ़ाते हैं तो यही इसका विनाश भी करते हैं। मानव जाति का इतिहास गवाह है कि भूत में कई सभ्यताएं तबाह हो गईं जिनके मलबे से खाद-पानी लेकर नई सभ्यताओं ने जन्म लिया और फली-फूली हैं। यही वजह है कि मानव भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है। उसकी अधिकतर योजनाएं बेहतर भविष्य के लिए होती हैं। लेकिन हर आदमी, हर समाज और हर सभ्यता व संस्कृति हमेशा बेहतर नहीं साबित होती। अक्सर इंसानी अनुमान धरे केधरे रह जाते हैं और भविष्य कुछ का कुछ हो जाता है।
वामपंथी चिंतक कार्ल मार्क्स का आकलन था कि पूंजीवादी व्यवस्था अपनी तबाही के लिए खुद ही रास्ते बनाती है। यही वजह है कि एक दिन यह व्यवस्था तबाह हो जाएगी और इसके स्थान पर नई व्यवस्था सामने आएगी। नई व्यवस्था क्या होगी इसकी भी मार्क्स ने कल्पना की और बताया कि वह साम्यवादी व्यवस्था होगी। लेकिन ऐसा हुआ क्या? आज लगभग पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था है। सोवियत रूस जैसे देशों में साम्यवादी व्यवस्था आई भी तो वह पूंजीवादी व्यवस्था से प…
परिवर्तन लाजमी है तो डरना क्यों?
- ओमप्रकाश तिवारी
मानव सभ्यता अंतरविरोधों के परमाणु बम जैसी है। इसके अंतरविरोध परिवर्तनशील बनाकर इसे आगे बढ़ाते हैं तो यही इसका विनाश भी करते हैं। मानव जाति का इतिहास गवाह है कि भूत में कई सभ्यताएं तबाह हो गईं जिनके मलबे से खाद-पानी लेकर नई सभ्यताओं ने जन्म लिया और फली-फूली हैं। यही वजह है कि मानव भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है। उसकी अधिकतर योजनाएं बेहतर भविष्य के लिए होती हैं। लेकिन हर आदमी, हर समाज और हर सभ्यता व संस्कृति हमेशा बेहतर नहीं साबित होती। अक्सर इंसानी अनुमान धरे केधरे रह जाते हैं और भविष्य कुछ का कुछ हो जाता है।
वामपंथी चिंतक कार्ल मार्क्स का आकलन था कि पूंजीवादी व्यवस्था अपनी तबाही के लिए खुद ही रास्ते बनाती है। यही वजह है कि एक दिन यह व्यवस्था तबाह हो जाएगी और इसके स्थान पर नई व्यवस्था सामने आएगी। नई व्यवस्था क्या होगी इसकी भी मार्क्स ने कल्पना की और बताया कि वह साम्यवादी व्यवस्था होगी। लेकिन ऐसा हुआ क्या? आज लगभग पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था है। सोवियत रूस जैसे देशों में साम्यवादी व्यवस्था आई भी तो वह पूंजीवादी व्यवस्था से प…