रविवार, 25 मार्च 2012

उनकी नजाकत पर आंकड़ों की नफासत तो देखिए

- ओमप्रकाश तिवारी
आंकड़े बेजुबान होते हैं लेकिन बहुत कुछ कहते हैं। बेदर्द लगते हैं पर संवेदनशील होते हैं। तस्वीर नहीं होते लेकिन तस्वीर बनाते हैं। आईना नहीं होते लेकिन तस्वीर दिखाते हैं। कलाकार नहीं होते लेकिन कलाकारों के औजार होते हैं। बेजान दिखते हैं लेकिन उनमें कई सच धड़कता है। चतुर सुजान अपना सच उनके माध्यम से छिपाते हैं और भ्रम फैलाते हैं लेकिन आंकड़ों की अदा देखिए कि वह सच ही कहते हैं और सच ही दिखाते हैं।
योजना आयोग का कहना है कि देश से गरीबी घट रही है। करोड़ों बिलबिलाते और तिलतिल कर मरने वालों के देश में सचमुच यह खुश होने वाली खबर है। क्या यह सच है या हकीकत पर खुशफहमी का परदा डालने की नादान होशियारी है। योजना आयोग कहता है कि यदि कोई शहरी प्रतिदिन 28 रुपये 65 पैसे खर्च करता है तो वह गरीब नहीं है। जबकि गांवों में 22 रुपये 42 पैसे खर्च करने वाले को गरीब नहीं कहा जा सकता। इस तरह महीने में 859 रुपये 60 पैसे खर्च करने वाला शहरी और 672 रुपये 80 पैसे खर्च करने वाला ग्रामीण गरीब की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
आप सरकार हैं। कोई भी श्रेणी बनाएं और उसमें डाल दें। गरीब आदमी क्या कर सकता है? उसे तो यह भी नहीं पता कि उसके लिए आप कितने चिंतित हैं। अपनी कारीगरी से उसके कुनबे को ही कम कर दे रहे हैं। किसी गरीब को यदि यह पता चले तो वह जरूर पूछेगा कि जरा एक दिन इतने पैसे में जिंदगी जी कर दिखाइए जनाब। कसम से, मां से नानी तक की याद न आए जाए तो कहना। माफ कीजिएगा, हत्या खंजर, बंदूक या बम से ही नहीं की जाती। करोड़ों लोगों के अस्तित्व को जिस नजाकत-नफासत से आपने इनकार कर दिया, कत्ल तो उसे भी कहते हैं। फर्क वश इतना है कि हत्या करने वाले सजा पाते हैं और आप ईनाम के हकदार हो जाते हैं।
आप कहते हैं कि पिछले पांच वर्षों में गरीबी घटी है। वर्ष 2004-05 के मुकाबले वर्ष 2010-11 में गरीबी 7.3 प्रतिशत कम हो गई है। वर्ष 2010-11 देश में गरीबी की दर 29.8 फीसदी रह गई, जबकि पांच साल पहले यह 37.2 फीसदी थी। अब देश में करीब 34.37 करोड़ लोग गरीब हैं, जबकि 2004-05 में 40.72 करोड़ लोग गरीब थे।
सच क्या है आप बेहतर जानते हैं। कोई भी संवेदनशील, समझदार और चिंतनशील इनसान इन आंकड़ों पर विश्वास नहीं करेगा। वैसे भी ये आंकड़े आपकी नीयत को दर्शाते और बताते हैं। हकीकत तो यह है कि देश की करीब 70 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीने को मजबूर है।
आप कहते हैं कि शहर में करीब 860 रुपये प्रतिमाह कमाने वाला गरीब नहीं है। हिसाब लगाकर देखिए, दस हजार रुपये प्रतिमाह कमाने वाला भी ठीक से गुजारा नहीं कर पा रहा है। किसी भी शहर में हजार रुपये प्रतिमाह से कम का एक कमरा किराये पर नहीं मिलता। (इस एक हजार वाले भी आप नहीं रह सकते) यदि किसी व्यक्ति को शहर में किराये का कमरा लेकर रहना है तो वह 860 रुपये में कैसे रहेगा? उसकी कमाई तो कमरे के किराये को भी पूरा नहीं करती? फिर खाएगा क्या और पहनेगा क्या? आपको यकीन नहीं होगा लेकिन ऐेसे हालात में देश में करोड़ों लोग रह रहे हैं।
मान लो यदि किसी का शहर में अपना घर है, तो क्या वह अपने परिवार का भरण-पोषण इतने पैसों में कर लेगा? आधा किलो दूध भी लेगा तो आधे पैेसे तो इसी में चले जाएंगे। 15 किलो आटा के 200 रुपये तो 15 किलो चावल के करीब 375 रुपये हो जाते हैं। इस तरह आटा, चावल और दूध के ही हजार रुपये से ऊपर हो गए। कपड़े-लत्ते, हारी-बीमारी का क्या? बच्चों की स्कूल फीस और किताबों का क्या ? सब्जी कहां से आएगी? और नमक भी तो नहीं खरीद पाएंगे? दाल की बात तो दूर की कौड़ी हो जाएगी। कहीं आने जाने के लिए किराया कहां से लाएंगे? किसी दिन रेस्टोरेंट में खाने का मन हुआ तो क्या आपके घर चले जाएंगे?
जाहिर है कि जिन आंकड़ों से आप सच को छिपाना चाह रहे हैं वहीं आंकड़े आपकी हकीकत बयां कर रहे हैं। आप अपनी नजाकत पर खुश और मुग्ध हो सकते हैं। लेकिन आंकड़ों की नफासत तो देखिए वे अपने ही रचनाकार पर मुस्कुरा रहे हैं। सृजनकर्ता को हत्यारा बता रहे हैं।

शनिवार, 10 दिसम्बर 2011

बंद बोतल में पुरानी शराब


लोकपाल एक बार फिर चर्चा में है। ऐसे में इसके बारे में कुछ जानकारियां काफी दिलचस्प हैं। मैंने यह लेख सितंबर २००४ में लिखा थ। नवभारत टाइम्स से इसे अपने सितंबर २००४ के अंक में प्रकाशित किया था। ऐसा नहीं है कि लोकपाल आज का मुद्दा है। समय -समय पर यह मामला आता रहा है। इस लेख को पढ़कर इसे समझा जा सकता है। - ओमप्रकाश तिवारी

लोकपाल का मामला एक बार फिर उठा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से लोकपाल की नियुक्ति में देरी का कारण बताने को कहा है। पिछले दिनों अदालत ने महान्यायवादी हरीश साल्वे से पूछा कि अखबार खोलने पर रोज एक नया घोटाला सामने आता है , तो ऐसे में क्या यह ठीक नहीं होगा कि सार्वजनिक जीवन में पांव पसारते भ्रष्टाचार के मद्देनजर लोकपाल की नियुक्ति कर दी जाए। इस पर श्री साल्वे ने पिछले साल लोकसभा में पेश हो चुके लोकपाल विधेयक का जिक्र किया। अब देखना यह है कि सरकार क्या कदम उठाती है।
यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि जो काम सरकार को करना चाहिए , उसकी याद अदालत दिला रही है। इससे तो यही लगता है कि वह अपने कर्तव्यों का सही तरह से पालन नहीं कर रही है। आखिरकार लोकपाल की कल्पना इसीलिए की गई थी कि हर रोज हो रहे घोटालों पर अंकुश लगाया जा सके , लेकिन यह कल्पना आज तक मूर्त रूप महज इसलिए नहीं ले पाई क्योंकि राजनेता ऐसा नहीं चाहते। यही कारण है कि लोकपाल पर चर्चा होती है , लोकसभा में विधेयक भी पेश हो जाता है , लेकिन कोई न कोई ऐसी अड़चन डाल दी जाती है कि वह पारित नहीं हो पाता। ऐसा देखा गया है कि लोकपाल विधेयक को ऐसे अवसर पर पेश किया जाता है कि उस पर बहस के लिए समय ही नहीं मिलता और बात आई-गई हो जाती है। दरअसल हमारे राजनेताओं के लिए लोकपाल बोतल में बंद उस जिन्न की तरह है , जो बाहर निकलते ही पलट कर मार कर सकता है।
14 अगस्त 2001 को संसद के मानसून सत्र में लोकपाल विधेयक 2001 पेश करके प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस संस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का इजहार किया , लेकिन इससे पहले कि यह विधेयक पारित हो पाता सत्र खत्म हो गया। उसके बाद किसी ने याद भी नहीं किया कि ऐसा विधेयक पेश किया गया था। इससे इन आरोपों को बल मिला है कि इस विधेयक को पेश करने के पीछे सरकार की मंशा कुछ और थी। उस वक्त भ्रष्टाचार को लेकर वाजपेयी सरकार पर लगातार उंगलियां उठ रही थीं। यूटीआई मामले में उनके कार्यालय पर आरोप लगे थे और उन्होंने अपने पद से इस्तीफे की धमकी दे दी थी। इसलिए जब लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया गया तो बहुत से लोगों ने सोचा कि यह बढ़ते भ्रष्टाचार से जनता का ध्यान हटाने के लिए उठाया गया कदम है। बावजूद इसके यदि यह विधेयक संसद में पास हो जाता और लोकपाल नामक संस्था अस्तित्व में आ जाती , तो इससे जनता को कुछ उम्मीद बंधती , क्योंकि इसमें प्रधानमंत्री तक को जांच के दायरे में लाया गया था।
इस विधेयक के अनुसार लोकपाल और इसके सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति एक समिति की सिफारिश के आधार पर करेंगे। उपराष्ट्रपति , प्रधानमंत्री , लोकसभा अध्यक्ष , गृहमंत्री , सदन के नेता तथा लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता इस समिति के सदस्य होंगे। लोकपाल की जांच के दायरे में प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद के सदस्यों , सांसदों और सरकारी कर्मियों को रखा गया था। विधेयक के मुताबिक लोकपाल भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम 1988 के तहत मिली शिकायतों के आधार पर सार्वजनिक पद पर बैठे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ जांच कर सकता है। लोकपाल को यह न्यायिक अधिकार होगा कि वह किसी भी व्यक्ति को सम्मन भेजकर हाजिर होने , किसी दस्तावेज को मांगने और साक्ष्य लेने का आदेश जारी कर सकता है। लोकपाल की जांच के दायरे से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश , निर्वाचन आयुक्तों तथा अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों को बाहर रखा गया है। उल्लेखनीय है कि ऐसा पहली बार था कि लोकपाल को कुछ अधिकार दिए गए थे , नहीं तो इससे पहले जितनी बार भी यह विधेयक लोकसभा में पेश किया गया , उसे शक्तिहीन बनाए रखने का पूरा प्रावधान किया गया था।
इस बार जब लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया गया था तो कांग्रेस ने भी इसका समर्थन किया था , लेकिन यह पारित नहीं हो पाया। तब से कोई इसकी सुध नहीं ले रहा है। यदि हमारे राजनेताओं में भ्रष्टाचार से लड़ने की इच्छाशक्ति होती और वे सचमुच इस पर अंकुश लगाना चाहते , तो उनकी प्राथमिकता सूची में लोकपाल विधेयक होना चाहिए था।
1969 से लेकर अब तक आठ बार लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया गया है। मोरारजी देसाई की अध्यक्षता वाले प्रशासनिक सुधार आयोग ने नागरिकों की शिकायतें दूर करने के बारे में अपनी अंतरिम रिपोर्ट 1966 में दी थी , जिसमें अन्य बातों के अलावा स्वीडन के ओम्बड्समैन की तरह लोकपाल संस्था स्थापित करने की सिफारिश थी। आयोग की इस सिफारिश पर अमल करते हुए पहली बार चौथी लोकसभा में 1968 में विधेयक पेश किया गया। यह 1969 में पारित भी हो गया , लेकिन राज्यसभा की मंजूरी मिलने से पहले लोकसभा ही भंग हो गई। इसके बाद इसे 1971 में पांचवीं लोकसभा में फिर पेश किया गया। फिर इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया। समिति ने जुलाई 1978 में अपनी रिपोर्ट भी दे दी , लेकिन जब इस रिपोर्ट पर लोकसभा में चर्चा हो रही थी , तभी लोकसभा फिर भंग हो गई। इसके बाद इसे 1985 में आठवीं लोकसभा में लाया गया , लेकिन फिर वापस ले लिया गया। इसे 1989 में फिर लोकसभा में पेश किया गया। इस बार इसके जांच के दायरे में प्रधानमंत्री को भी लाया गया था , लेकिन नौवीं विधानसभा के भंग होने से यह प्रस्ताव निरस्त हो गया। 13 सितंबर 1996 को 11 वीं लोकसभा में एक बार फिर लोकपाल विधेयक प्रस्तुत किया गया। इसे गृह मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति को जांच करने और रिपोर्ट देने के लिए सौंपा गया। समिति ने 9 मई 1997 को अपनी रिपोर्ट दे दी , लेकिन इससे पहले कि सरकार उसकी सिफारिशों को अमली जामा पहना पाती , लोकसभा भंग हो गई। यही हाल इसका 12 वीं लोकसभा में हुआ , जब संसदीय समिति की रिपोर्ट पर विचार होने से पहले ही लोकसभा भंग हो गई। लेकिन आठवीं बार लोकसभा तो सही सलामत रही , पर नेताओं में ही इस पर एका नहीं बन पाया।
ऐसे में यह मानना सही होगा कि लोकपाल विधेयक पेश करने का मकसद भ्रष्टाचार से सचमुच लड़ना नहीं , लड़ते हुए दिखना भर है। भ्रष्टाचार सिर्फ भारत की ही नहीं , एक वैश्विक समस्या है। इसलिए दूसरे देशों में इससे लड़ने के लिए हो रही कोशिशें हमारे लिए गौर करने लायक हैं। स्वीडन में 1909 में ओम्बुड्समैन नामक संस्था की परिकल्पना की गई , जिसे 1919 में फिनलैंड ने मूर्त रूप दिया। इसके बाद 1955 में डेनमार्क ने , 1962 में न्यूजीलैंड ने और 1964 में ब्रिटेन ने इसे अपनाया। अलबत्ता इन सभी देशों में इसका उद्देश्य समान होते हुए भी रूप भिन्न है। यानी सभी ने अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से इसे लागू किया।
भारत में तो आजादी के बाद से ही लोकपाल की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी , क्योंकि हमें जो सत्ता अंग्रेजों ने हस्तांतरित की थी , उसकी बुनियाद ही भ्रष्टाचार पर टिकी थी। स्वाभाविक ही था कि आजादी के साथ हमें भ्रष्टाचार भी मिला। इससे जूझने के लिए लोकपाल की जरूरत महसूस की गई , लेकिन राजनीतिक स्वार्थों ने इसे हकीकत में बदलने नहीं दिया। अब जबकि अदालत ने सरकार से इस बारे में पूछा है , तो देखना यह है कि वह क्या कदम उठाती है। लेकिन इतना तो तय ही है कि इसके प्रति सरकार ही नहीं , विपक्ष का भी उदासीन रवैया परेशान करने वाला है।














शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

आचरण के आईने में गलत-सही का द्वंद्व


मुख्य चुनाव आयुक्त डाक्टर एसवाई कुरैशी ने पिछले दिनों कहा कि पूरी दुनिया इस बात की तारीफ करती है कि भारत जैसे विविधता वाले और ७१ करोड़ से अधिक मतदाता वाले देश में सफलतापूर्वक चुनाव सम्पन्न हो जाते हैं। लेकिन जब वह यह कहते हैं कि आपकी व्यवस्था में अपराधी संसद और विधानसभाओं में चुनकर क्यों आ जाते हैं, तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। उन्हें यह तर्कसंगत नहीं लगता कि कानून के अनुसार अंतिम अपील कोर्ट में दोषी सिद्ध होने तक किसी को दोषी नहीं माना जा सकता।

इस द्वंद्व और अंतर्विरोध को हम इस तरह से समझ सकते हैं। जिसकी जैसी मानसिकता उसका आचारण भी वैसा ही होता है। आदमी के आचारण में ही उसकी मानसिकता परिलक्षित होती है। भ्रष्ट मानसिकता वाला भ्रष्टाचार की संस्कृति को ही पुष्पित-पल्वित करता है। अपराध की मानसिकता वाला अपराध की गंगा-जमुना बहाने में ही पूरी जिंदगी लगा रहता है। इसी तरह अपराधी और भ्रष्टाचारी के आचरण से ही हम उसकी मानसिकता को समझ सकते हैं। ऐसी मानसिकता और ऐसे आचरण वाले किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक होते हैं। इसलिए ऐसे लोगों की जगह नागरिक समाज में नहीं होनी चाहिए। बेशक इस तरह के अधिकतर लोग कानून के दायरे से या तो बाहर होते हैं या फिर दांव-पेंच से खुद को बेहतर नागरिक साबित करने में लगे रहते हैं। ऐसे लोगों का कथन होता है कि जब तक उन्हें अदालत से सजा नहीं मिल जाती उन्हें दोषी नहीं माना जा सकता। कानूनन वह सही होते हैं लेकिन उनका आचरण उन्हें गलत साबित कर रहा होता है। कानून की प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल होती है कि ऐसे लोगों को कानून के शिकंजे में कसने में बहुत समय लग जाता है। कानूनी प्रक्रिया में बहुत सारे लोग शाम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना कर बइज्जत बरी भी हो जाते हैं। कुछ ही होते हैं जिन पर कानून अपना शिकंजा कस पाता है। कई बार इसमें अंतर करना मुश्किल हो जाता है कि जो बइज्जत बरी हो गया है वह वाकई दोषमुक्त है। अथवा जो दंडित हुआ है वाकई दोषी है। इसका यह मतलब नहीं है कि कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनानी चाहिए। तमाम खामियों के बावजूद इसका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन मानसिकता और आचरण से किसी का कृत्य छिपा नहीं रहता। ऐसे लोगों को कानून बेशक पाक-साफ घोषित कर दे लेकिन समाज में न तो उन्हें प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए और न ही महत्वपूर्ण दायित्व।

मुख्य चुनाव आयुक्त डा. कुरैशी पूछते हैं कि बिना दोष सिद्ध हुए जेलों में २,५७,९५८ लोग बंद हैं लेकिन उनके जैसे आरोपी नेता बनकर सारी सुविधाएं क्यों भोग रहे हैं? इस तरह आम आदमी की स्वतंत्रता का हनन क्यों किया जा रहा है? वह कहते हैं कि इस सवाल पर न्यायपालिका और संसद में बहस होनी चाहिए। बहस न्यायपालिका और संसद में ही नहीं समाज में भी होनी चाहिए। आखिरकार ऐसे लोगों को दंडि़त करने की अंतिम जिम्मेवारी समाज की ही है।

हाल ही में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल सर्वे की रिपोर्ट आई है, जिसमें सबसे ज्यादा भ्रष्ट राजनीतिक दलों को बताया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के लोग सियासी दलों के बाद पुलिस को सबसे अधिक भ्रष्ट मानते हैं। उसके बाद सांसद, फिर सरकारी अधिकारी, उसके बाद शिक्षा विभाग और फिर उद्योगपति हैं। ऐसे लोगों के मामले अदालतों में बेशक लंबित हों लेकिन उनके आचरण के आधार पर तो उन्हें संसद या विधानसभाओं में जाने से रोका ही जाना चाहिए। यदि ऐसे लोग संसद या विधानसभाओं में जाते हैं तो हम एक बेहतर समाज की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
सच तो यह है कि देश का बहुत बड़ा वर्ग केवल वोटर बनकर रह गया है। हमारे नेता उनसे वोट लेते हैं और फिर उन्हें भूल जाते हैं। संसद और विधानसभाओं में पहुंचने वाले लोग अपनी कमाई दोगुनी और चौगुनी करने में लग जाते हैं। उनके इर्दगिर्द ऐसे लोगों की चौकड़ी जमा हो जाती है जिनका मकसद अपना स्वार्थ साधना होता है। ऐसे में आम लोग हाशिए पर चले जाते हैं। यह अकारण नहीं है कि देश की आधे से अधिक आबादी गरीबी की नाली में कीड़े-मकोड़े की तरह बिलबिला रही है और मुठ्ठी भर लोग ऐश कर रहे हैं। सड़कों पर कुछ लोगों की चमचमाती कारों की वजह से आम आदमी का पैदल चलना दूभर हो गया है। बसों और ट्रेनों में आम आदमी पशुवत यात्रा कर रहा है और इवाई जहाज का किराया बढ़ जाता है तो सरकार की त्योरी चढ़ जाती है और हवाई कंपनियों को किराया कम करना पड़ता है। दूसरी ओर आम आदमी की बुनियादी वस्तुओं की कीमतें आसमान को छू रही होती हैं और सरकार के कान पर जंू तक नहीं रेंगती। सत्ता और समाज के प्रभु वर्ग में ऐसी सांठगांठ हो गई है कि आम आदमी की सिसकियां न तो किसी को सुनाई दे रही हैं और न ही उसका आंसू किसी को दिखाई दे रहा है।

भ्रष्टाचार में सियासी दल पहले तो सांसद तीसरे नंबर पर क्यों हैं? यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब राजनीतिक दलों और सांसदों को ही देना होगा। समय रहते यदि उन्होंने इसका उत्तर नहीं दिया तो वक्त उन्हें खुद ही जवाब दे देगा। जब से मानव सभ्यता ने इस धरती पर जन्म लिया है तब से कई सभ्यताएं आईं और गर्इं। वर्तमान व्यवस्था भी कोई अपवाद नहीं होगी। इसे बचना है तो इस बात को स्वीकार करना होगा कि जिन राजनेताओं पर आरोपपत्र दाखिल हो गए हैं और जिनके खिलाफ अदालत में कार्यवाही चल रही है उन्हें चुनाव से दूर ही रखा जाए। इसके अलावा आम लोगों को भी भ्रष्टचारियों और दागियों से घृणा करनी होगी चाहे वह किसी भी वर्ग का हो। जिनके आचरण को हम गलत मानते हैं उनके हाथों में सत्ता सौंपने का मतलब है अपना मर्सिया खुद पढऩा। जैसा कि आजकल हम देख रहे हैं। आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला और टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, खाद्यान्न घोटाला, जमीन घोटाला तो इसकी ताजा मिसाल हैं। इन सब मामलों में लिप्त लोगों को कानून बेशक पाक-साफ घोषित कर दे लेकिन ऐसे लोगों का आचरण समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के लायक तो कदापि भी नहीं है।

बुधवार, 18 अगस्त 2010

चित्तौड़गढ़ में राजस्थानी कवि का सम्मान


मेवाड़ के बहुत गहरी समझ वाले राजस्थानी के सादे विचारों वाले साहित्यकार महाराज शिवदान सिंह के दोहों को लेकर चित्तौडगढ में सेंथी स्तिथ डॉ. सत्यनारायण व्यास के निवास स्थान पर पंद्रह अगस्त की शाम चार बजे नगर के प्रबुद्ध लोगों के बीच एकल काव्य पाठ आयोजित किया गया.बहुत अरसे के बाद नगर में हुए इस काव्य पाठ के पहले सत्र में कवि शिवदान सिंह के विस्तृत परिचय के साथ ही संभागियों का स्वागत डॉ. व्यास ने किया.अभी तक प्रकाशित अपनी तीन किताबों की प्रतिनिधि रचनाओं को पढ़ते हुए कवि सिंह ने श्रोताओं को भाव विभोर किया. सिंह ने दोहे पढ़ने से पहले अपने कवि बनने तक का का सफ़र व्यंग शैली में जताया .कुछ गहरी समझ और कुछ नए नवेले श्रोताओं को ये काव्य पाठ अलग अलग स्तर पर प्रभावित करता रहा.
मूल रूप से भीलवाड़ा जिले के कारोई के महाराजा होते हुए भी फूटपाथ की सी रचनाएँ करते हुए शिवदान सिंह ने जीवन की अनुभूतियों को बहुत गंभीरता के साथ अपने साहित्य कर्म में समेटा है.सतत्तर सालों की उम्र पार कवि सिंह बेहद सरल और मृदुभाषी है.राजस्थानी के साथ-साथ वे मूर्तिकला और चित्रकारी में भी महारथ हासिल व्यक्तित्व हैं.उनकी प्रकाशित किताबों में ''कुण दूजो कोइ न'',''जो सुगमाना जीवणा'',''मैं मन हूँ'' हैं.यथासमय उन्हें सम्मानित भी किया जाता रहा है.ख़ास तौर पर सोरठा दोहों की रचना करने वाले शिवदान ने जो दोहे पढ़े उनमें ईश्वर,मन,मेहमान,राह,प्रकृति,ब्रमांड,जीवन,रोग,दवाई आदि विषय को समेटा.

डॉ. व्यास और डॉ. ओमा आनंद सरस्वती ने शिवदान के व्यक्तित्व पर कहा कि वो गाय द्वारा पांतरे दिए जाने वाले देशी घी की तरह हैं.मेवाड़ के इस गौरवशाली कवि को पहली बार चित्ताद में ढंग से सूना जा रहा था.उनके दोहे बहुत क्लिष्ट नहीं होकर बहुत रूप में लोक जीवन से जुड़ाव वाले हैं.इस तरह की रचानाओं को समझने में लोक जीवन से जुड़ा आदमी सहज अनुभव करता है.सही मायाने में शिवदान का रचना कर्म और वे खुद अल्पज्ञात हैं.उनके दोहों में धारा प्रवाह और सम्प्रेषणियता विद्यमान है. सम्पूर्ण समूह ने ऐसी घोष्ठियों को सतत करने की ज़रूरत व्यक्त की.

गोष्ठी के दूजे सत्र में नगर के आमंत्रित कवियों ने भी प्रतिनिधि रचनाएँ भी पढी जिससे माहौल पूरी तरह से सार्थक बन पढ़ा.जिनमें शिव मृदुल,नन्द किशोर निर्झर ,मनोज मख्खन,गीतकार रमेश शर्मा,अब्दुल जब्बार और श्रीमती व्यास शामिल हैं.गोष्ठी में डॉ. आर.के.दशोरा,रेणु व्यास,डॉ. कनक जैन,प्राचार्य एस.के.जैन,प्रो. एल.एस.चुण्डावत,डॉ. सीमा श्रीमाली,पत्रकार जे.पी.दशोरा,सरोकार संस्था संयोजक विकास अग्रवाल,प्राध्यापक गोविन्द राम शर्मा,चन्द्रकान्ता व्यास, सिंहशावक राणावत,शिव शंकर व्यास उपस्थित थे. अंत में आभार शिक्षाविद डॉ. ए.एल.जैन ने व्यक्त किया.


मधुरेश, ज्योतिष जोशी और डॉ.शोभाकांत झा को प्रमोद वर्मा सम्मान

द्वितीय प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह-2010

वाणी परमार को प्रथम शोध वृति अज्ञेय और शमशेर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

रायपुर । प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा हिन्दी आलोचना में उल्लेखनीय योगदान के लिए 2010 का प्रमोद वर्मा सम्मान प्रख्यात कथा-आलोचक मधुरेश और युवा आलोचक ज्योतिष जोशी को प्रदान किया गया । इसके अलावा प्रमोद वर्मा रचना सम्मान से वरिष्ठ ललित निबंधकार डॉ. शोभाकांत झा को अंलकृत किया गया तथा वाणी परमार को एक वर्ष की शोधवृत्ति प्रदान की गई । प्रेमंचद जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में प्रतिष्ठित रचनाकार-आलोचक द्वय डॉ. धनंजय वर्मा और नंदकिशोर आचार्य ने क्रमश- 21, 11 व 7 हज़ार रुपये की नगद राशि, स्मृति चिन्ह, अलंकरण पत्र प्रदान कर रचनाकारों का सम्मान किया । इस प्रतिष्ठित सम्मान के चयन समिति के सदस्य थे – केदार नाथ सिंह, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, विजय बहादुर सिंह, डॉ. धनंजय वर्मा व विश्वरंजन । इसके पूर्व यह सम्मान श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन को मिल चुका है । 1965 से आलोचना कर्म में सक्रिय श्री मधुरेश ने कहा कि उनकी सोच साहित्य में सकारात्मकता से है । रचना और आलोचना में ईमानदारी पर बल दिये बग़ैर जो कार्य होता है वह स्थायी नहीं होता । समय उसका नोटिस नहीं nslennलेता । युवा आलोचक श्री जोशी ने अपने वक्तव्य में कहा कि संस्कृति आलोचना साहित्य तक ही सीमित नहीं होती । रचना की समीक्षा भावप्रक्रिया की उपज है । आलोचना पाठक को मार्ग दिखाता है । आज हम बाज़ारवाद की राजनीतिक समस्या से घिरे हुए हैं, इसीलिए भाषा की गति बुरी हो रही है । मुख्य अतिथि श्री आचार्य ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि साहित्य ज्ञानार्जन है । साहित्य, कला में अनुभूति की अहमियत होती है । साहित्य को जानने के लिए अनुभूति के साथ विचार भी आवश्यक है ।
अलंकरण समारोह में 20 से अधिक किताबों का विमोचन भी विभिन्न विद्वान साहित्यकारों के हाथों संपन्न हुआ जिसमें नई त्रैमासिकी पांडुलिपि, अज्ञेय पर केंद्रित कृति ‘कठिन प्रस्तर में अगिन सुराख’ (विश्वरंजन), शमशेर पर केंद्रित कृति ‘ठंडी धुली सुनहरी धूप’ (विश्वरंजन), ‘शिलाओं पर तराशे मज़मून’ (डॉ. धनंजय वर्मा पर एकाग्र), मीडिया : नये दौर,नयी चुनौतियाँ (संजय द्विवेदी, भोपाल),‘पक्षी-वास’ (अनुवादक-दिनेश माली, उड़ीसा), झरोखा (पंकज त्रिवेदी, अहमदाबाद),विष्णु की पाती – राम के नाम (विष्णु प्रभाकर के पत्र- जयप्रकाश मानस), ‘कहानी जो मैं नहीं लिख पायी’ (कुमुद अधिकारी, नेपाल), डॉ. के. के. झा, बस्तर की 11 किताबें और लघु पत्रिका ‘देशज’ (अरुण शीतांश, आरा) प्रमुख हैं ।
अंलकरण समारोह के पश्चात अज्ञेय और शमशेर की जन्मशताब्दी वर्ष के परिप्रेक्ष्य में ‘अज्ञेय की शास्त्रीयता’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. कमल कुमार,दिल्ली डॉ. आनंदप्रकाश त्रिपाठी-सागर, डॉ.देवेन्द्र दीपक-भोपाल, डॉ. रति सक्सेना-त्रिवेंन्द्रम, डॉ. सुशील त्रिवेदी-रायपुर, बुद्धिनाथ मिश्र-देहरादून, महेन्द्र गगन-भोपाल श्री प्रकाश मिश्र-इलाहाबाद, माताचरण मिश्र-भोपाल,श्री संतोष श्रेयांस-आरा आदि ने अपने आलेखों का पाठ किया । संगोष्ठी के अध्यक्ष मंडल में थे नंदकिशोर आचार्य, डॉ. धंनजय वर्मा व श्री मधुरेश । द्वितीय सत्र केंद्रित था–‘शमशेर का कविता-संसार’ विषय पर । वक्ता थे डॉ. रोहिताश्व-गोवा, प्रभुनाथ आजमी-भोपाल, ज्योतिष जोशी-दिल्ली, नरेन्द्र पुंडरीक-बांदा, बक्सर, संतोष श्रीवास्तव-मुंबई, दिवाकर भट्ट-हलद्वानी, मुकेश वर्मा-भोपाल, कुमार नयन-बक्सर, डॉ. सुधीर सक्सेना-दिल्ली । सत्र को अपनी अध्यक्षीय गरिमा प्रदान की दिविक रमेश, डॉ. त्रिभुवन नाथ शुक्ल, डॉ. धनंजय वर्मा ने ।
अलंकरण समारोह की पूर्व संध्या 30 जुलाई को कविता पाठ से दो दिवसीय राष्ट्रीय समारोह का प्रारंभ हुआ जिसमें देश के प्रतिष्ठित कवि- सर्वश्री नंदकिशोर आचार्य, दिविक रमेश, बुद्धिनाथ मिश्र, श्रीप्रकाश मिश्र, नरेंद्र पुंडरीक, अनिल विभाकर, रति सक्सेना सुधीर सक्सेना अरुण शीतांश, संतोष श्रेयांश, शशांक शेखर, कुमुद अधिकारी(नेपाल), कुमार नयन, जयशंकर बाबु आदि ने अपनी श्रेष्ठ कविताओं का पाठ किया । इसभी सत्रों का संचालन क्रमशः अशोक सिंघई, संजय द्विवेदी, मिर्जा मसूद और गिरीश पंकज ने किया । इस अवसर पर टैगोर, शमशेर, अज्ञेय, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एवं प्रमोद वर्मा की कविताओं की प्रदर्शनी भी आयोजित की गई । आयोजन में देश एवं राज्य के लगभग 500 साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों एवं शिक्षाविदों ने अपनी भागीदारी रेखांकित की ।

जयप्रकाश मानस
संपादक
सृजनगाथा

शनिवार, 14 अगस्त 2010

मगही दिवस के रूप मे मनेगी योगेश की जयंती

बाढ़ । मगही कवि स्व. योगेश्वर सिंह योगेश की पुण्यतिथि समारोह के मौके पर बीती रात नीरपुर गांव मे अखिल भारतीय मगही-कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन की अध्यक्षता साहित्यकार (magahi akadami ke adhyaksh) उदय शंकर ने की जबकि संचालन मगही के चर्चित कवि रामाश्रय झा ने किया। सम्मेलन मे बिहार व यूपी की विभिन्न जगहो से आये साहित्य- काव्य के कई दिग्गज पुरोधा शामिल हुए। कवियो की व्यंगात्मक व समाजिक कुरितियो पर प्रहार करती काव्य रस की सुर सरिता मे श्रोतागण देर रात तक झूमते रहे। हिसुआ से आये चर्चित कवि दीनबंधु, कवि कारू गोप, जयराम जी, व गोपालगंज के पंकज जी समेत अन्य साहित्यकारो ने सामाजिक अव्यवस्था पर चोट करती कविता पाठकर लोगो को मंत्र मुग्ध कर दिया। इस मौके पर कवि योगेश फाउंडेशन के द्वारा मगही मंडल के अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार डा. रामनंदन जी को 2010 का योगेश शिखर सम्मान प्रदान किया गया। एक साथ जुटे मगही साहित्य के दिग्गजो ने इस मौके पर घोषणा किया कि कवि स्व. योगेश की जयंती 23 अक्टूबर को मगही दिवस के रूप मे मनाया जायेगा। समापन समारोह को संबोधित करते हुए मृत्युंजय कुमार ने कहा कि कवि योगेश जी की 1950 के दशक की दुर्लभ पांडुलिपियां मगही मंडल व बिहार सरकार को साप देंगे ताकि मगही साहित्य का प्रचार प्रसार व्यापक रूप से हो सके।

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

वापस ली गईं नया ज्ञानोदय की प्रतियां


ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका में विभूति नारायण राय के विवादास्पद साक्षात्कार में लेखिकाओं के बारे में की गई टिप्पणी के बाद उठे तूफान को शांत करने के लिए बाजार से नया ज्ञानोदय की विवादित प्रतियां वापस ले ली गई हैं। इसके संपादक रवीन्द्र कालिया ने इस पूरे मामले के लिए हिंदी समाज से क्षमा मांगी है। ज्ञानपीठ के निर्देशक रवीन्द्र कालिया ने कहा कि बाजार में बची हुई नया ज्ञानोदय पत्रिका की प्रतियां वापस ले ली गई हैं और साक्षात्कार के हिस्से को हटाकर दो एक दिन में इसे फिर से प्रकाशित कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह के सिलसिले में गोवा प्रवास में होने के कारण वह अपने संपादकीय दायित्वों का निर्वहन नहीं कर सके, जिसके चलते पत्रिका में यह भूल चली गई।
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