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वाराणसी में फ्लाईओवर का गिरना और सात सितारा दफ्तर में जश्र को होना

वाराणसी में निर्माणाधीन फ्लाईओवर के दो बीम गिरने की खबर जिसने में सुनी और देखी वह दहल गया। इतना दर्दनाक हादसा कइयो ने शायद अपनी जिंदगी में पहली बार देखा हो। कुछ लोग जो शाम को अपने घरों को लौट रहे थे उनके ऊपर अचानक पहाड़ सा बीम गिर जाता है। उनकी गाडिय़ां पिचक जाती हैं और उनकी जिंदगी एक पल में खत्म हो जाती है। शुरूआती खबरों में बताया कि १८ लोगों के शव मिले हैं लेकिन ५० से अधिक लोग मलबे में दबे हैं। हालांकि बचाव कार्य में लगे कई लोगों ने मरने वालों की संख्या १०० से अधिक बता रहे थे। इतने लोगों की जिंदगी को लील जाने वाला फ्लाईओवर बेहद लापरवाही से बनाया जा रहा था। जाहिर है कि इसमें भ्रष्टाचार भी खूब हुआ होगा। यह भी तय है कि इसे बनाते समय कई मजदूरों ने अपनी जान से पहले भी हाथ धो चुके होंगे। कई मजदूर अंग-भंग होकर घर पर बेकाम बैठ गए होंगे। उनके बारे में खबर नहीं दिखाई और प्रकाशित की गई। वैसे भी मजदूरों की खबर तब तक खबर नहीं होती जब तक कि वह वोट में न तब्दील हो जाएं। मजदूरों कर्मचारियों की बात करने वालों को आजकल देशद्रोही तक कह दिया जाता है। हालांकि चुनावी भाषणों में हर कोई इनका कल्याण करने की…
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कुछ पाने की लालसा में उपजी कुंठा

रवीश कुमार ने अपने प्राइम टाइम में नामवर सिंह पर रिपोर्ट क्या दिखा दी कुछ लोगों को बुरा लग गया। उसी दिन से बहुत कुछ लिखा जा रहा है। 1995 से मैं नामवर सिंह का नाम सुन रहा हूं। कभी उनसे मुलाकात नहीं हुई। कभी उनके किसी कार्यक्रम में भी नहीं गया। उनके एक दो साक्षात्कार जरूर पढ़े हैं। हां,  उनका नाम काफी सुना है। कई लोग मिले जो उन्हें कोसते थे। अभद्र भाषा का भी इस्तेमाल करते थे। कई लोग मिले जो उनकी तारीफ भी करते थे। लेकिन मैं नहीं जानता कि नामवर सिंह कैसे हैं। एक समय था कि हिंदी साहित्य की आलोचना में उनकी तूती बोलती थी। कोई ऐसा कार्यक्रम शायद ही होता था जो उनके बिना होता हो। घर का जोगी जोगड़ा में काशीनाथ सिंह ने उन्हें एक बेहतर इंसान, अच्छे शिक्षक और बेहतरीन आलोचक के रूप में चित्रित किया है। शायद उन्होंने भाई होने का धर्म निभाया हो। लेकिन मुझे वह संस्मरण अच्छा लगा। दरअसल मुझे नामवर सिंह से कुछ पाने या हासिल करने की कोई लालसा कभी नहीं रही। नामवरों से मैं वैसे भी थोड़ा दूर रहना पसंद करता हूं। रहता भी हूँ। यही वजह रही कि उनसे कोई ईर्ष्या द्वेष नहीं रख पाया। प्राइम टाइम में जब उन पर रिपोर्ट देखी…

ये मैं हूं तुमने क्या जाना

कमजोर को सहेजना
गिरते को है उठाना
पिटते को है बचाना
घाव पर दवा लगाना
रोते को है हंसाना
दर्द के आंसू पोछना
रोटी बांट कर खाना
पसीने में मुस्कुराना
श्रम का मेहनताना
ताना नहीं है मारना
झूठ पर ही गुस्साना
सच के साथ है रहना
तबियत से शूफ़ियाना
न किसी को बरगलाना
तम को ही है भगाना
सच के दीप जलाना
न किसी पर मुस्कुराना
मिजाज है आशिकाना
संकट में भी न घबराना
भेष बदल कर न आना
खुद से ही होगा सामना
बीच में न टांग अड़ाना
आता है भिड़ भी जाना
ये मैं हूं तुमने क्या जाना
- ओमप्रकाश तिवारी

ये मैं हूं तुमने क्या जाना

कमजोर को सहेजना गिरते को है उठाना
पिटते को है बचाना
घाव पर दवा लगाना
रोते को है हंसाना
दर्द के आंसू पोछना
रोटी बांट कर खाना
पसीने में मुस्कुराना
श्रम का मेहनताना
ताना नहीं है मारना
झूठ पर ही गुस्साना
सच के साथ है रहना
तबियत से शूफ़ियाना
न किसी को बरगलाना
तम को ही है भगाना
सच के दीप जलाना
न किसी पर मुस्कुराना
मिजाज है आशिकाना
संकट में भी न घबराना
भेष बदल कर न आना
खुद से ही होगा सामना
बीच में न टांग अड़ाना
आता है भिड़ भी जाना
ये मैं हूं तुमने क्या जाना
- ओमप्रकाश तिवारी

कृषि मेले में जादूगर का आना...और कृषि मंत्री को किसानों की हूटिंग...

रोहतक में प्रदेश सरकार की ओर से आयोजित तीन दिवसीय किसान मेले के अंतिम दिन सोमवार को प्रदेश के कृषि मंत्री ओपी धनखड़ किसानों को संबोधित कर रहे थे तो किसान उनकी हूटिंग कर रहे थे। किसानों ने कृषि मंत्री को बोलने तक नहीं दिया। इसी तरह किसानों ने केंद्रीय इस्पात मंत्री बीरेंद्र सिंह को भी बोलने नहीं दिया। लेकिन बीरेंद्र सिंह ढीठ निकले। उन्होंने कहा कि तुम्हें नहीं सुनना है, मत सुनो, लेकिन मैं तो बोलूंगा। वह बोले भी, लेकिन किसानों ने नहीं सुना। बाद में केंद्रीय मंत्री नितिन गडगरी ने पानी और पराली के माध्यम से कुछ भावुक किस्म का भाषण दिया तो किसानों ने सुन लिया।
नितिन गडकरी ने कहा कि वह पंजाब की नदियों का पाकिस्तान जा रहा पानी हरियाणा को देंगे। किसानों को लगा कि बंदे में दम है। पानी हरियाणा और पंजाब की सियासत में काफी मायने रखता है। जब भी चुनाव आता है पानी का मुद्दा प्रदेश की फिजाओं में गूंजने लगता है। सभी राजनीतिक दल इस पर अपने-अपने तरीके से वार और पलटवार की सियासत करते हैं। लेकिन समाधान आज तक नहीं निकला। हरियाणा के नेता कहते हैं कि हम अपने हिस्से का पानी लेकर रहेेंगे और पंजाब के नेता कहते…

यूं ही जहरीली नहीं होती जा रही हवा

जो खबरें हैं वे गायब हैं
खबरें गढ़ी जा रही हैं
बनाई जा रही हैं
किसी के अनुकूल
किसी के प्रतिकूल
अपनी पसंद की
उसकी पसंद की
खबर जो होनी चाहिए थी
कुछ दंगाइयों ने कर लिया अपहरण
खबर वह बन गई
जो दंगाई चाहते थे
खबर वह बन गई
जो आतंकी चाहते थे
हर रोज अखबार के पन्नों में
खबर के नाम पर
परोस दिया जाता है
तमाम तरह की गढ़ी गई खबरें
ठोक पीटकर बनाई गई खबरें
आदेश-निर्देश से लिखी-लिखाई गई खबरें
कौन चाहता है इन्हें पढऩा
समाचार न विचार
केवल एक किस्म का अचार
टीवी चैनलों पर बहस का शोर
कूपमंडूक लोग फैला रहे होते हैं ध्वनि प्रदूषण
बहुत कष्ट और शोक के साथ
बंद कर देना पड़ता है टीवी
कई-कई दिन नहीं देखते हैं
टीवी पर समाचार
नहीं देखना और सुनना है
झूठ का व्याभिचार
सूचना विस्तार के युग में
गायब कर दी गई है सूचना
हर पल प्रसारित की जा रही है
गैरजरूरी गैर वाजिब सूचना
सूचना के नाम पर
अफवाहों का पैकेज
प्रसारित किया जा रहा है
अंधाधुंध चौबीस घंटे
रिफाइंड करना मुश्किल हो गया है
काम की खबरों को
शक होने लगा है
अखबार में छपी
मुस्कराती तस्वीर पर
सवाल उठता है कि क्यों हंस रहा है
क्या मिल गया है…

संत मत परंपरा को तहस-नहस कर दिया गुरमीत राम रहीम ने

सचाई, ईमानदारी और समानता की नींव पर खड़े डेरे को झूठ और आडंबर का शाही महल बना दिया

संत मत का अनुसरण करने वाला डेरा सच्चा सौदा आजकल सुर्खियों में है। वजह है डेरे की गद्दी पर आसीन गुरमीत राम रहीम, जिसे दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में 20 साल की सजा मिली है। राम रहीम रोहतक की सुनारिया जेल में बंद है। किसी संत परंपरा वाले गुरु के लिए इससे शर्मनाक हरकत और कोई नहीं हो सकती। लेकिन गुरमीत तो संत है ही नहीं। संत और सूफी परंपरा से तो उसका कोई लेना देना ही नहीं है। उसने तो सूफी और संत परंपरा को पथभ्रष्ट ही नहीं, बल्कि तहस-नहस कर दिया। सादगी, सच्चाई, भाईचारा और समानता की पक्षधर संत परंपरा को गुरमीत ने लूट, ठगी, बेईमानी और अपराध का गढ़ बना दिया। आज न जाने कितने सच डेरा सच्चा सौदा में दफन हैं। इसमें कोई शक नहीं कि यह डेरे के करोड़ों अनुयायियों के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ है।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम पर कई तरह के आरोप लगे और लग रहे हैं। कुल मिलाकर संत से बाबा बने गुरमीत राम रहीम ने देश की एक ऐसी परंपरा का नाश कर दिया, जिसमें देश के बहुसंख्यक आबादी की धड़कनें बसतीं थीं। जिसकी अप…