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मई, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हत्याएं इस तरह भी की जाती हैं....

एक मित्र ने फोन करके बताया कि हिंदी आउट लुक के नए अंक में एक परिचर्चा प्रकाशित की गई है। इसमें नया ज्ञानोदय के संपादक श्री रवींद्र कालिया, उपन्यासकार श्री असगर वजाहत और पत्रिका के संपादक श्री आलोक मेहता के विचार हैं। इसी परिचर्चा में श्री कालिया ने देश में हो रही कन्या भ्रूण हत्या पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस विषय पर हिंदी के लेखक मौन हैं। इसमें कोई शक नहीं कि आज देश में यह समस्या महामारी का रूप लेती जा रही है। इस पर लेखकों की चुप्पी चिंता की विषय है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि किसी ने कुछ काम ही नहीं किया है। खुद कालिया जी ने नया ज्ञानोदय के मार्च-२००८ अंक में मेरी कहानी कु़डीमार प्रकाशित की है। आश्चर्य होता है कि जब वह यह कह रहे थे कि इस विषय पर कहानी नहीं लिखी गई है तो उन्हें इस कहानी की याद यों नहीं आई? काम नही हो रहा है, यह शिकायत जायज है, लेकिन जो काम हो रहा है उसे रेखांकित न करना या यह उस लेखक के साथ अन्याय नहीं है? दोस्तो, किसी को मारने के लिए चाकू और बंदूक की ही जरूरत नहीं होती। हत्याएं इस तरह भी की जाती हैं....।

आंगन में बाजार गायब फुटपाथ

इस बार गांव गया तो देखा वहां से निकल रहे हाइवे से फुटपाथ ही गायब है। पहले यह सड़क कम चाै़डी थी, अब अधिक चाै़डी हो गई है। जब कम चाै़डी थी तो उसके किनारों पर इंर्ट के खडंजे लगे थे। उसके बाद पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ हुआ करता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। सड़क चाै़डी हुई तो खडंजे सहित फुटपाथ भी गायब हो गया। अब पैदल यात्री और साइकिल से चलने वाले कहां जाएं? यह भी देखने में आया कि बाजार तो आंगन तक में घुस गया। जो वस्तुएं शहरों में बिक रही हैं वही गांव में भी धड़ल्ले से बिक रही हैं। गांव की युवा पीढ़ी दातुन के बजाए पेस्ट करती है। ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो शहर की सीमा ताे़डकर गांवों में पहंुच गई हैं। लेकिन आम आदमी के उपयोग में आने वाला फुटपाथ गायब हो गया है। सड़क पर चलते हुए आम आदमी कहा जाए? बाजार ने आम आदमी को हाशिए पर डाल दिया है लेकिन यही बाजार आम आदमी से उसका हाशिया भी छीन ले रहा है। फुटपाथ पर चलते हुए आम आदमी जिंदगी के सपने देखता था। अब उसके चलने के रास्ते को ही खत्म कर दिया गया है तो उसके सपनों का या होगा? इसे आम आदमी के सपनों की हत्या नहीं कहेंगे? इस देश में आम आदमी जरूरत है? यह व्यवस

दुआ करें कि उन्हें सद्बुद्धि आए

शाम को आफिस पहंुचा तो एक बैरंग पत्र मिला। पत्र पर किसी भेजने वाले का जिक्र नहीं था। एक बार देखकर मन में कई आशंकाएं तैर गइंर्...। पत्र को खोलकर देखा तो गुस्से में दिमाग उबल गया। किसी ने बड़ी वाहियात हरकत की थी। धार्मिक भावना को भुनाने का इतना भ ा मजाक मुझे पसंद नहीं आया। पहले इस तरह के पत्र लोग पम्पलेट की तरह छापकर बांटते थे। और दावा करते थे कि ऐसा करने से उन्हें फायादा हुआ, आप भी ऐसा करें आपको भी लाभ होगा। अब ऐसी मानसिकता के लोग बैरंग पत्र भेजकर इस तरह की हरकत कर रहे हैं। यह एक तरह की धमकी है और ब्लैकमेलिंग भी। ऐसे लोगों को दंडित करने का प्रावधान होना चाहिए? आप बहुत धार्मिक हैं और धर्म का प्रचार करना चाहते हैं तो अपने दम पर करें। किसी की भावना से यों खेलते हैं? बैरंग पत्र भेजकर और पहचान छिपाकर यों कर रहे हैं? आस्तिकता, नैतिकता और ईमानदारी का तकाजा है कि आप जो कुछ भी करें अपने दम करें, किसी की भावना से खिलवाड़ न करें। इस तरह के पत्र भेजने वाले केवल भावना से ही नहीं खेलते, बल्कि धमकाते भी हैं। साफ लिखते हैं कि इस पत्र को इतने दिनों में बांटें। अपने पास न रखें, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा।